चंद्रकांता | Chandrakanta

चंद्रकांता – देवकीनंदन खत्री हिंदी पुस्तक पीडीऍफ़ में | Chandrakanta – Devkinandan Khatri hindi book in pdf

चंद्रकांता – देवकीनंदन खत्री हिंदी पुस्तक पीडीऍफ़ में | Chandrakanta – Devkinandan Khatri hindi book in pdf के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : चंद्रकांता है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Devkinandan Khatri | Devkinandan Khatri की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 7.68 MB है | पुस्तक में कुल 266 पृष्ठ हैं |नीचे चंद्रकांता का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | चंद्रकांता पुस्तक की श्रेणियां हैं : Stories, Novels & Plays, Uncategorized

Name of the Book is : Chandrakanta | This Book is written by Devkinandan Khatri | To Read and Download More Books written by Devkinandan Khatri in Hindi, Please Click : | The size of this book is 7.68 MB | This Book has 266 Pages | The Download link of the book "Chandrakanta" is given above, you can downlaod Chandrakanta from the above link for free | Chandrakanta is posted under following categories Stories, Novels & Plays, Uncategorized |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी : ,
पुस्तक का साइज : 7.68 MB
कुल पृष्ठ : 266

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व पद्दिला दिस्सा मैंसा 1 वाधने की कोई जरूर नहीं शेर का शिकार पैदल दी किया जायगा | दूसरे दिन सवेरे बनरखों ने हाजिर होकर श्रर्ज किया कि इस जगल में शेर तो दे मगर रात हो जासे के सबब हम लोग उन्हें थ्रपनी श्ॉखो से न देव सके अगर झ्ाज का दिन शिकार न खेला जाय तो दम लोग देख कर उनका पता दे सकेंगे | श्राज के दिन भी शिकार खेलना बन्द किया गया । पहर भर दिन बाकी रहे इन्द्रजीतसिंद और श्ानन्दुरसिंह घोडो पर सवार हो श्रपने दोर्नी + खास शेर के शिकार में मेसा बॉधा जाता है । मैँसा बॉधिने के दो कारण हैं । एक तो शिकार को श्रटकाने के लिए श्रथात्‌ जब बनरखे श्ाकर खबर दें कि फलाने जगल में शेर है उस वक्त या कई दिनों तक अगर शिकार खेलने वाले को किसो कारण शिकार खेलने की फुरसत न दुई श्रीर शेर को श्रटकाना चाहा तो मंसा वॉधने का हुक्म दिया जाता है । बनरयखे मैंसा ले जाते हैं श्रौर जिस जगह शेर का पता लगता है उसके पास ही किसी भयानक श्ौर सायेदार जगल या नाले मे मजबूत खू ठा गाड़ कर मेंसे को बाँध देते हैं । जब शेर भंसे की दू पाता है तो वह्दों आता है श्रीर मैंसे को खा कर उसी जगल मे कई दिनों तक मस्त और चेफिक पडा रहता है । इस तकीब से दो चार भसा देकर महतनो शर को झटका लिया जाता है । शेर को. जब तक खाने के लिए मिलता है व दूसरे जगल में नहीं जाता । शेर का पेट श्गर एक दफे खूब भर जाय . तो उसे सात श्राठ दिनों तक खाने को परवाह नही रहता । खुले भेंसे को शेर जटदी नहीं मार सकता | दूसरे जय मचान वॉध कर शेर का शिकार किया चाइते है या एक जंगल से दूसरे जंगल सं अपन सुबीते के लिए उसे ले जाया चाहते ह तब भो इसी तरह मैसे बॉव बॉबव कर इटाते ले जाते ह । इसको शिकार। लय प्मर शी कहते है ।

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