ध्यान सूत्र | Dhyan Sutra

ओशो – ध्यान सूत्र हिंदी पुस्तक पीडीऍफ़ | Osho – Dhyan Sutra In Hindi PDF

ओशो – ध्यान सूत्र हिंदी पुस्तक पीडीऍफ़ | Osho – Dhyan Sutra In Hindi PDF के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : ध्यान सूत्र है | इस पुस्तक के लेखक हैं : osho | osho की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 2.65 MB है | पुस्तक में कुल 95 पृष्ठ हैं |नीचे ध्यान सूत्र का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | ध्यान सूत्र पुस्तक की श्रेणियां हैं : Uncategorized

Name of the Book is : Dhyan Sutra | This Book is written by osho | To Read and Download More Books written by osho in Hindi, Please Click : | The size of this book is 2.65 MB | This Book has 95 Pages | The Download link of the book "Dhyan Sutra" is given above, you can downlaod Dhyan Sutra from the above link for free | Dhyan Sutra is posted under following categories Uncategorized |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी :
पुस्तक का साइज : 2.65 MB
कुल पृष्ठ : 95

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(01110. 0011 00916 10 50000 (15 ॥/1016€ (05100 90016 ध्यान-सूत्र (ओशो) प्रवचन-पहला ओशो) प्रवचन- मेरे प्रिय आत्मन्‌ सबसे पहले तो आपका स्वागत करूं-इसलिए कि परमात्मा मैं आपकी उत्सुकता है-इसलिए कि सामान्य जीवन के ऊपर एक साधक के जीवन में प्रवेश करने की आकांक्षा है-इसलिए कि संसार के अतिरिक्त सत्य को पाने की प्यास है। सौभाग्य है उन लोगों का जो सत्य के लिए प्यासे हो सकें। बहुत लोग पैदा होते हैं बहुत कम लोग सत्य के लिए प्यासे हो पाते हैं। सत्य का मिलना तो बहुत बड़ा सौभाग्य है। सत्य की प्यास होना भी उतना ही बड़ा सौभाग्य है। सत्य न भी मिले तो कोई हर्ज नहीं लेकिन सत्य की प्यास ही पैदा न हो तो बहुत बड़ा हर्ज है। सत्य यदि न मिले तो मैंने कहा कोई हर्ज नहीं है। हमने चाहा था और हमने प्रयास किया था हम श्रम किए थे और हमने आकांक्षा की थी हमने संकल्प बांधा था और हमने जो हमसे बन सकता था वह किया था। और यदि सत्य न मिले तो कोई हर्ज नहीं लेकिन सत्य की प्यास ही हममें पैदा न हो तो जीवन बहुत दुर्भाग्य से भर जाता है। और मैं आपको यह भी कहूं कि सत्य को पा लेना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना सत्य के लिए ठीक अर्थों में प्यासे हो जाना है। वह भी एक आनंद है। जो क्षुद्र के लिए प्यासा होता है वह क्षुद्र को पाकर भी आनंद उपलब्ध नहीं करता। और जो विराट के लिए प्यासा होता है वह उसे न भी पा सके तो भी आनंद से भर जाता है। इसे पुनः दोहराऊं-जो क्षुद्र के लिए आकांक्षा करे वह अगर क्षुद्र को पा भी ले तो भी उसे कोई शांति और आनंद उपलब्ध नहीं होता है। और जो विराट की अभीप्सा से भर जाए वह अगर विराट को उपलब्ध न भी हो सके तो भी उसका जीवन आनंद से भर जाता है। जिन अर्थों में हम श्रेष्ठ की कामना करने लगते हैं उन्हीं अर्थों मैं हमारे भीतर कोई श्रेष्ठ पैदा होने लगता है। कोई परमात्मा या कोई सत्य हमारे बाहर हमें उपलब्ध नहीं होगा उसके बीज हमारे भीतर हैं और वे विकसित होंगे। लेकिन वे तभी विकसित होंगे जब प्यास की आग और प्यास की तपिश और प्यास की गर्मी हम पैदा कर सकें। मैं जितनी श्रेष्ठ की आकांक्षा करता हूं उतना ही मेरे मन के भीतर छिपे हुए वे बीज जो विराट और श्रेष्ठ बन सकते हैं वे कंपित होने लगते हैं और उनमें अंकुर आने की संभावना पैदा हो जाती है। जब आपके भीतर कभी यह खयाल भी पैदा हो कि. परमात्मा को पाना है जब कभी यह खयाल भी पैदा हो कि शांति को और सत्य को उपलब्ध करना है तो इस बात को स्मरण रखना कि आपके भीतर कोई बीज अंकुर होने को उत्सुक हो गया है। इस बात को स्मरण रखना कि आपके भीतर कोई दबी हुई आकांक्षा जाग रही है। इस बात को स्मरण रखना कि कुछ महत्त्वपूर्ण आंदोलन आपके भीतर हो रहा है। उस आंदोलन को हमें सम्हालना होगा। उस आंदोलन को सहारा देना होगा। क्योंकि बीज अकेला अंकुर बन जाए इतना ही काफी नहीं है। और भी बहुत-सी सुरक्षाएं जरूरी हैं। और बीज अंकुर बन जाए इसके लिए बीज की क्षमता काफी नहीं है और बहुत-सी सुविधाएं भी जरूरी हैं। जमीन पर बहुत बीज पैदा होते हैं लेकिन बहुत कम बीज वृक्ष बन पाते हैं। उनमें क्षमता थी वे विकसित हो सकते थे। और एक-एक बीज में फिर करोड़ों-करोड़ों बीज लग सकते थे। एक छोटे-से बीज में इतनी शक्ति है कि एक पूरा जंगल उससे पैदा हो जाए। एक छोटे-से बीज में इतनी शक्ति है कि सारी जमीन पर पौधे उससे पैदा हो जाएं। लेकिन यह भी हो सकता है कि इतनी विराट क्षमता इतनी विराट शक्ति का वह बीज नष्ट हो जाए और उसमें कुछ भी पैदा न हो। एक बीज की यह क्षमता है एक मनुष्य की तो क्षमता और भी बहुत ज्यादा है। एक बीज से इतना बड़ा विराट विकास हो सकता है एक पत्थर के छोटे-से टुकड़े से अगर अणु को विस्फोट कर लिया जाए तो महान ऊर्जी का जन्म होता है बहुत शक्ति का जन्म होता है। मनुष्य की आत्मा और मनुष्य की चेतना का जो अणु है अगर वह विकसित हो सके अगर उसका विस्फोट हो सके अगर उसका विकास हो सके तो जिस शक्ति और ऊर्जा का जन्म होता है उसी का नाम परमात्मा है। परमात्मा को हम कहीं पाते नहीं हैं बल्कि अपने ही विस्फोट से अपने ही विकास से जिस ऊर्जा को हम जन्म देते हैं जिस शक्ति को उस शक्ति का अनुभव परमात्मा है। उसकी प्यास आपमें है इसलिए मैं स्वागत करता हूं। लेकिन इससे कोई यह न समझे कि आप यहां इकट्ठे हो गए हैं तो जरूरी हो कि आप प्यासे ही हों। आप यहां इकट्ठे हो सकते हैं मात्र एक दर्शक की भांति भी। आप यहां इकट्ठे हो सकते हैं एक मात्र सामान्य जिज्ञासा की भांति भी। आप यहां इकट्ठे हो सकते हैं एक कुतूहल के कारण भी। लेकिन कुतूहल से कोई द्वार नहीं खुलते हैं। और जो ऐसे ही दर्शक की भांति खड़ा हो उसे कोई रहस्य उपलब्ध नहीं होते हैं। इस जगत में जो भी पाया जाता है उसके लिए बहुत कुछ चुकाना पड़ता है। इस जगत में जो भी पाया जाता है उसके लिए बहुत कुछ चुकाना पड़ता है। कुतूहल कुछ भी नहीं चुकाता। इसलिए कुतूहल कुछ भी नहीं पा सकता है। कुतूहल से कोई साधना में प्रवेश नहीं करता। अकेली जिज्ञासा नहीं मुमुक्षा! एक गहरी प्यास!

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7 Comments
  1. Raj Kumar Sharma says

    happy

  2. khajan says

    I really like osho audio spich and books

  3. samar says

    gud job
    but
    i wanted that book which is english basically in which there are many types of meditations.
    and how to make any work a meditation.
    please help.

  4. Mohit says

    nice

  5. manoj says

    Your PDF book is so good but I have to login in your app again and again

  6. prem says

    Thank you

  7. inder prakash says

    free pdf dhyan darsan/dhyan sutra

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