शेखर - एक जीवनी | Shekhar - Ek Jeevni

शेखर – एक जीवनी : अज्ञेय | Shekhar – Ek Jeevni : Agyey

शेखर – एक जीवनी : अज्ञेय | Shekhar – Ek Jeevni : Agyey के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : शेखर - एक जीवनी है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Sachchidanand Heeranand Vatsyayan 'Agyey' | Sachchidanand Heeranand Vatsyayan 'Agyey' की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 13 MB है | पुस्तक में कुल 372 पृष्ठ हैं |नीचे शेखर - एक जीवनी का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | शेखर - एक जीवनी पुस्तक की श्रेणियां हैं : Stories, Novels & Plays, suggested

Name of the Book is : Shekhar - Ek Jeevni | This Book is written by Sachchidanand Heeranand Vatsyayan 'Agyey' | To Read and Download More Books written by Sachchidanand Heeranand Vatsyayan 'Agyey' in Hindi, Please Click : | The size of this book is 13 MB | This Book has 372 Pages | The Download link of the book "Shekhar - Ek Jeevni" is given above, you can downlaod Shekhar - Ek Jeevni from the above link for free | Shekhar - Ek Jeevni is posted under following categories Stories, Novels & Plays, suggested |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी : ,
पुस्तक का साइज : 13 MB
कुल पृष्ठ : 372

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शेखर । एक जीवनी सजित होने का कोई कारण नहीं जानता। | तुम जीवित नहीं है। मेरे, शेलर के बनने में हो तुम टूट गई हो-शायद स्वयं शेखर के हाथों ही टूट गई हो। और मैं अपने मन में बार-बार बह दुहराकर कि ‘शशि नहीं है, राशि मर गई है, शशि नहीं है भी यह समझ नहीं पाता है क्या था—अपनी चति का कोई अनुमान नहीं लगा सकता, कोई अनुभव नहीं प्रदेश जीवन को दुबारा की रा हैं। मै को छदा आगे ही देखता रहा, अपनी जीवन-यात्रा के अन्तिम पड़ाव पर पहुँचकर, पीछे देल जा हैं कि मैं कहाँ से अतकर, किरकिर मूत-भटकर, कैसे-कैसे विचित्र अनुभव प्राप्त करके वहाँ तक आया हूँ। और तव दौलता है कि मेरी भटकन में भी एक प्रेरणा थी, जिसमें अन्तिम विजय का अकुर था, मेरे अनुभव-वैविध्य में भी एक विशेष रस की उपभोगेच्छा थी जो मेरा निर्देश कर रही थी। और जीवन-यात्रा के पथ में जो पहाड़, तराइयाँ, नदी नाणे, झाड़-झलाह, आँची-पानी आये उन सत्र में मेरे और केवल मेरे सम्बन्ध में एक ऐप था, जिसका ध्येय या किसी विशेष काल में, विशेष परिस्थिति में, विशेष स्थान पर, विशेष साधना और उपायों से, मेरे जीवन का विशेष रूप से समापन, जिससे उसे अपनी सिदि, अपनी सफलता, और अपनी सम्पूर्णता प्राप्त हो शाय...अव में अधूरा हैं, पर मुझमें कुछ भी न्यूनता नहीं है, अपूर्ण हैं, पर मेरी सम्पूर्णता के लिए कुछ भी बोड़ने को स्थान नहीं है। सिवाय इस प्रत्ययलोकन के । शायद, जीवन-पथ केअन्तिम पड़ाव का चयेच ही यही है, क्योंकि मुझे इससे, और इस मात्र से, तृप्ति मिलती है... क्यों ? क्यों... तलवार कैसे यह जान पाये कि तान अब टूट गई है, जब तक कि वह स्वयं भोडी न हो जाय, या दूड न जाय...और मैं अभी जीता हैं, अभी जल रहा हैं, अभी हैं । पर, तब मै क्यों कहूँ कि तुम नहीं हो ! जो सान तलवार को बनाती है, वह तब तक नहीं दूता, जब तक कि तलवार नहीं टूटती। मुझे भरना है, काँसी पर झूलकर मरना है, पर अभी मै बीता हैं। | मैं तुमसे भगता हैं कि मुझे आशा दो, मैं तुम्हें याद करें। जहाँ तुम हो वहाँ ‘याद' शब्द को खाना पूजा को अप्त करने-सा है, फिर भी मैं तुम से माँगता हैं, वह भी अधिकार युके दो। तुम मर गई हो, अत्यन्त नम हो गई हो, यही मुझे अपने आप को समझने दो और इसके लिए उसे सामने लाने दो।जिसे मैं ' समझेतुम्हारी छायादें, ग्नेि कभी मैं च समझता थ... नहीं, वह पर नहीं दिये कि मैने चराकर पूछा , क्या होता है, शशि ! और तुमने गई हुई, बेहोश होती हुई अनाज़ में कहा था, 'मुल, नइया, सुस..." उस पर को कण ही भर से अधिक सामने आने देने की धमता मुझ में नहीं है। मुझे याद आता है, कभी ऐसा भी था कि हम सब भाव से मिलते सबसे पहले हुम, गरि।। इसलिए नहीं कि तुम बीवन में सस्ते पहले आई या कि तुम सबसे ताकी स्मृति हो। इसलिए कि मेरा होना अनिवार्य रूप से द्वन्तरे होने को लेकर-क वैसे ही जैसे इतबार में मार का होना खान के पूर्वस्त्रना मना है। तुम मर न हो हो, विस र मेरा जीवन बराबर चढ़ाया जाफर तेज़ होता रहा है–तर मॅवॉव कर मै कुछ या हैं जो संसार के आगे खड़ा होने में सक्ति नहीं है

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1 Comment
  1. vaibhar says

    अापका सर्गह अौर अापका काम दोनो काबिले तारीफ है

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