हँस | Hans

हँस | Hans

हँस | Hans के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : हँस है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Munshi Premchand | Munshi Premchand की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 74.1 MB है | पुस्तक में कुल 75 पृष्ठ हैं |नीचे हँस का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | हँस पुस्तक की श्रेणियां हैं : literature

Name of the Book is : Hans | This Book is written by Munshi Premchand | To Read and Download More Books written by Munshi Premchand in Hindi, Please Click : | The size of this book is 74.1 MB | This Book has 75 Pages | The Download link of the book " Hans" is given above, you can downlaod Hans from the above link for free | Hans is posted under following categories literature |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी :
पुस्तक का साइज : 74.1 MB
कुल पृष्ठ : 75

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ज्यों-ज्यों में सपना होता गया, त्य-स्था हिन्दी के नूतन साहित्य की ओर मेरा झुकाव बढ़ता गया। क्वींसकॉलेज में पढ़ते समय य या० रामकृच्छ बर्मा मेरे पिताजी के सहपाठियों में थे। भारतजीवन-प्रेस की पुस्तके प्रायः मेरे वहाँ अाया करती थीं ; पर अब पिताजी न पुस्तकों को छिपा कर रखने लगे। उन्हें डर हुआ कि कहीं मेरा चित्त काळ को पढ़ाई से हट न जाय—में बिगड़ न जाऊं। उन्हीं दिनों प० केदारनाथजी पाठक ने एक हिन्द-पुस्तकालय खोला था। मैं वहाँ से पुस्तकें ला-लाकर पढ़ा करता। एक बार एक आदमी साथ करके मेरे पिताजी ने मुझे एक बारात में काशी भेजा। मैं उसी के साथ घूमता-फिरता चौखंभे की ओर जा निकला। वहीं पर एक घर में से प० केदारनाथजी पाठक निकलते दिखाई पड़े। पुस्तकालय में वे मुझे प्रायः देखा करते थे। इससे मुझे देखते ही वे वहीं खड़े हो गये। बात-ही-बात में मालूम हुआ कि जिस मकान में । से वे निकले थे, वह भारतेन्दुजी का घर था। मैं बड़ी चाह और कुतूहल को दृष्टि से कुछ देर तक उस मकान की ओर, न जाने किन भावनाओं में लीन होकर, देखता रहा। पाठकही मेरी यह भावुकता देख बड़े प्रसन्न हुए और बहुत दूर तक मेरे साथ बातचीत करते हुए गये।

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