निरोग जीवन का राजमार्ग | Nirog Jeevan Ka Rajmarg

निरोग जीवन का राजमार्ग : पं० श्रीराम शर्मा आचार्य | Nirog Jeevan Ka Rajmarg : Pt. Shreeram Sharma Acharya

निरोग जीवन का राजमार्ग : पं० श्रीराम शर्मा आचार्य | Nirog Jeevan Ka Rajmarg : Pt. Shreeram Sharma Acharya के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : निरोग जीवन का राजमार्ग है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Pt. Shreeram Sharma Acharya | Pt. Shreeram Sharma Acharya की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 3.8 MB है | पुस्तक में कुल 48 पृष्ठ हैं |नीचे निरोग जीवन का राजमार्ग का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | निरोग जीवन का राजमार्ग पुस्तक की श्रेणियां हैं : ayurveda, health

Name of the Book is : Nirog Jeevan Ka Rajmarg | This Book is written by Pt. Shreeram Sharma Acharya | To Read and Download More Books written by Pt. Shreeram Sharma Acharya in Hindi, Please Click : | The size of this book is 3.8 MB | This Book has 48 Pages | The Download link of the book "Nirog Jeevan Ka Rajmarg" is given above, you can downlaod Nirog Jeevan Ka Rajmarg from the above link for free | Nirog Jeevan Ka Rajmarg is posted under following categories ayurveda, health |


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पुस्तक का साइज : 3.8 MB
कुल पृष्ठ : 48

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हमारे शरीर की रचना में कुछ ऐसी बनाई गई है कि अवांनी विजय द्वयों, संचित विषों, गंदी गस या विषैले पदार्थों को भिन्न भिन्न हार से निकलकर बाहर कर रहती है। हमारी टी-मोटी भूली—जैसे खानपान का असंयम, अत्यधि थकान, चलो ते, उठते-बैठते जीवन शक्ति की न्यूनत
चादि को प्रकृति स्वयं दुरुस्त करती हैं और प्रः प्र के इस उपयोगी कार्य या हमें पता भी नहीं चला। सृष्टि के सभी जीव-जंतु इन प्राकृतिक क्रिया से स्वस्थ रहते है। प्रकृति ने प्रत्येक शरीर में ऐसे ऐसे गुप्त द्वार रखे हैं, जिनके द्वारा विश्ले पदार्थ स्वयं निकलते रहते हैं और हमारी आकृति में यथोधित
दरा की अण्ण रखते है। यदै प्रकृति इस महान कार्य में अपने आप स्वाभाविक गति से संपन्न ५ करती, तो हमारे शरीर अंडों हो जाते, अंगों में गदापन और विषमता उत्पन्न हो जाती, हम लोग रोज हैं। अपचन, कब्ज, स्थूल, सूजन, फोड़े फुत्तो, गठिया, प्रमाद, सिर दर्द या अन्य ऐसे ही छोटे-मोटे रोगों के शिकार ॥ करते। भाग्यवश ऐसा नहीं है। हमारे शरीर के अंदर व्य प्रति इन विष्ले पदा से निरंतर संघर्ष करती रहती है, अनायक पद के शरीर में वरने नहीं देती और हमारे साधारण शारीरिक विकारों को दुरुस्त रती रहती है।

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