अनदेखे पुल | Andekhe Pul

अनदेखे पुल : से. रा. यात्री | Andekhe Pul : S. R. Yatri

अनदेखे पुल : से. रा. यात्री | Andekhe Pul : S. R. Yatri के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : अनदेखे पुल है | इस पुस्तक के लेखक हैं : S R Yatri | S R Yatri की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 7.9 MB है | पुस्तक में कुल 230 पृष्ठ हैं |नीचे अनदेखे पुल का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | अनदेखे पुल पुस्तक की श्रेणियां हैं : Stories, Novels & Plays, Uncategorized

Name of the Book is : Andekhe Pul | This Book is written by S R Yatri | To Read and Download More Books written by S R Yatri in Hindi, Please Click : | The size of this book is 7.9 MB | This Book has 230 Pages | The Download link of the book "Andekhe Pul" is given above, you can downlaod Andekhe Pul from the above link for free | Andekhe Pul is posted under following categories Stories, Novels & Plays, Uncategorized |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी : ,
पुस्तक का साइज : 7.9 MB
कुल पृष्ठ : 230

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हार्दिक प्रसन्नता हुई।
मुस्कराते हुए उर्मिला जी बोली-"आप तो एकदम उल्टी बात कह रहे है। गुरुजन तो आप है। आपके सामने तो हम गिरिजन है।''
मैं बोला-‘यदि आप गिरिजन हैं तब भी मेरे लिए प्रणम्य है क्योंकि इतने सदर सुरम्य गिरि शिखरों तथा उपत्यकाओ से घिरे अचल में रहने का सौभाग्य किसी अर्जित पुण्य प्रभाव से ही संभव है।''
इस पर उर्मिला मुंह बिचकाकर बोली-''ऐसा तो यहां कुछ नहीं है जिस पर दड़ा भारी गर्व किया जा सके। पूरा इलाका एकदम पिछड़ा हुआ ठेठ है। भले ही हम लोग मुख्यालय में रहते है पर वहा भी क्या है-लाल धूल और ऊंघती हुई जिंदगी । रात को कभी उधर आएंगे तो दिबरी को धुआं देती भुतही रात से डर जाएगे। भलो यहा भी कोई रह सकता है?
इस पर मैं कुछ कहता इससे पहले ही उर्मिला के पति पडित मुंकुद माधव की घोर गंभीर वाणी सुनाई पड़ी-भीतर के उल्लास से ही सब कही रहा जा सकता है। जिनके भीतर असतोष के अतिरिक्त कुछ बाकी ही नहीं बचता वही कुंठित रहते है। स्थान में क्या रखा है। उसे हम अपनी प्रज्ञा से रजित करते हैं।''
पंडित मुकंद माधव ने सारगर्भित वाक्य बोलकर मेरी ओर इस दृष्टि से देखी जैसे वह अपने कथन पर मेरी सहमति चाहते है।
मैने देखा कि उर्मिला का चेहरा अपने पति की बात सुनकर आवेश से लाल हो उठा। मेरा मित्र इस बीच उठकर अपने ड्राइवर से कुछ कहने चला गया था।
उन पति-पत्नी को एक-दूसरे से भिन्न मत रखने के कारण मैं क्या समझाता? मैने उनका ध्यान हटाने की गरज से पूछा-“आप लोग तो इस अचल के निवासी नही लगते । आप लोगो की शिक्षा-दीक्षा कहा-कहां हुई है ।
। इस पर उर्मिला ने तुरत कहा-''मैं तो भोपाल की रहने वाली हैं। वहीं से हिंदी मे एम ए.बी.एड किया है। तकदीर देखिए, कहां आकर रहना पड़ा रहा है। लगता है जैसे देश निकाला दे दिया गया हो ।”
मैने उर्मिला की कटूक्ति का कोई उत्तर न देकर पडित मुकद माधव से पूछा-और पंडित जी आपने कहां रहकर अध्ययन किया है। | "मैं तो बांदा का निवासी हैं। हमारी मिसिर खानदान चौदह पुश्तो से ज्योतिष शास्त्र के लिए प्रसिद्ध है। मैंने वाराणसेय काशी विश्वविद्यालय में अध्ययन किया है। वहीं से विशिष्टद्वैत में डाक्टरेट की पदवी प्राप्त की है।” “अरे आप तो बडे विश्रुत परिवार से सबध रखते हैं।” मैंने उन्हें सतुष्ट करने
अनदेखे पुल ।।

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