छाया मत छूना मन | Chhaya Mat Chhoona Man

छाया मत छूना मन : हिमांशु जोशी | Chhaya Mat Chhoona Man : Himanshu Joshi

छाया मत छूना मन : हिमांशु जोशी | Chhaya Mat Chhoona Man : Himanshu Joshi के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : छाया मत छूना मन है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Himanshu Joshi | Himanshu Joshi की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 6.3 MB है | पुस्तक में कुल 224 पृष्ठ हैं |नीचे छाया मत छूना मन का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | छाया मत छूना मन पुस्तक की श्रेणियां हैं : Stories, Novels & Plays

Name of the Book is : Chhaya Mat Chhoona Man | This Book is written by Himanshu Joshi | To Read and Download More Books written by Himanshu Joshi in Hindi, Please Click : | The size of this book is 6.3 MB | This Book has 224 Pages | The Download link of the book "Chhaya Mat Chhoona Man" is given above, you can downlaod Chhaya Mat Chhoona Man from the above link for free | Chhaya Mat Chhoona Man is posted under following categories Stories, Novels & Plays |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी :
पुस्तक का साइज : 6.3 MB
कुल पृष्ठ : 224

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अन्धेर है !" | वसुधा सोफे पर विखरे कपड़ों को जल्दी-जल्दी उठाने लगी। हैंगर पर टाँगती हुई बोली, ''सरकार नाम की कोई चीज़ रही या नहीं देवेन, लेकिन इतना अब मुझे भी लगने लगा है कि भगवान नाम की कोई वस्तु नहीं है ! होती तो दुनिया में अन्धेर न होता।"
उसने गहरी साँस ली। छोटे-मोटे गन्दे कपड़ों को तौलिये में लपेटकर झट से चारपाई के नीचे डाल दिया।
देवेन देखता रहा। फिर हँसता हुआ बोला, "अरी, ऐसा नहीं कहते ! तुम तो 'पुजारिन' हो ! सामने तुम्हारे किशन-कन्हाई हैं। सुनेंगे तो क्या
कहेंगे !”
दोनों हँस पड़े, एक साथ ।।
आराम से दूर तक पाँव फैलाकर, गरदन सोफ़े की पीठ पर झुकाकर, छत पर तेज़ी से घूमते पंखे की ओर देखता रहा वह।
"कंचन कहाँ है?'' उसे जैसे सहसा याद आया।
“होगी कहीं मटरगश्ती में ! घर से उसे क्या? कभी-कभी तो अब रात को भी नहीं लौटती ! माँ उसे कहीं का भी न रख छोड़ेगी !'' वसुधा की आकृति में अजब-सी उदासी उभर आयी। देवेन के जूते क़रीने से रखती हुई बोली, “अन्धेर है देवेन, अन्धेर !" ।
देवेन की आँखें मैदी थीं । रात-भर के सफ़र से वह काफ़ी थका-थका लग रहा था। पलकें नींद से बोझिल थीं। शरीर शिथिल ! | वसुधा रसोईघर में घुसकर जल्दी-जल्दी नाश्ता तैयार करने लगी। अँगीठी पर चाय का पानी रखा और स्टोव पर पतीली चढ़ाकर कुछ तलने लगी।
उन दिनों के बारे में सोचने लगी वसुधा जब देवेन दिल्ली में था । 'कृष्णा कमशियल एकेडमी' में दोनों साथ-साथ टाइपिंग सीखा करते थे । एकेडमी का मालिक शर्मा टाइप का अभ्यास कराते समय अनायास उसकी 10 / छाया मत छूना मन

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