इन्कलाब | Inqulab

इन्कलाब : ख्वाजा अहमद अब्बास | Inqulab : Khwaja Ahmad Abbas

इन्कलाब : ख्वाजा अहमद अब्बास | Inqulab : Khwaja Ahmad Abbas के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : इन्कलाब है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Khwaja Ahmad Abbas | Khwaja Ahmad Abbas की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 34.4 MB है | पुस्तक में कुल 437 पृष्ठ हैं |नीचे इन्कलाब का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | इन्कलाब पुस्तक की श्रेणियां हैं : Stories, Novels & Plays

Name of the Book is : Inqulab | This Book is written by Khwaja Ahmad Abbas | To Read and Download More Books written by Khwaja Ahmad Abbas in Hindi, Please Click : | The size of this book is 34.4 MB | This Book has 437 Pages | The Download link of the book "Inqulab " is given above, you can downlaod Inqulab from the above link for free | Inqulab is posted under following categories Stories, Novels & Plays |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी :
पुस्तक का साइज : 34.4 MB
कुल पृष्ठ : 437

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शुरू के इन शब्दों से भली भाति परिचित हो चुका था । | "सोने ससार जागे पाक परवरदिगार। हमारा-तुम्हारा खुया वायशाह, खुदा का बनाया न बादशाह । एक था बादशाह ।” | गुलाबो उसे जो भी कहानी सुनातीं थीं वह इसी तरह शुरू होती थी। उसमे दृमेशा एक बादशाह होता था । फर्क सिर्फ इसका होता था कि उसके औलाद कितनी है। कभी उसके सात बेटियां होती थी, कभी उसके सात बेटे होते थे। एक कहानी में उसके तीन वैदिया थी । इस कहानी में उसके सिर्फ एक बेटा था। | "बादशाहु अपने बेटे से बहुत प्यार करता था" गुलाबो अपनी नर्म मीठी मावाज में कहानी कहती रही । गुलाबो का शारीर जितना भारी-भरकम और कम्प था उतनी ही उसकी मात्रज मीठी और खूबसूरत थी। " तो जब पाहुणाबा अठारह बरस का हुआ तो एक दिन बादशाह ने उसे बुलाकर एक पौड़ा और एक तलवार दी और दिशा मालूम करने के लिए उसे एक कुतुबनुमा डिबिया दी।
" 'बेटा, जाओ, जाकर दुनिया की सैर करो,' बादशाह ने इससे कहा, 'और खुद दुनिया को देखो ।' उसने शाहजादे को एक बात के लिए मना भी किया। 'बेटा, पूरब जाना, उत्तर जाना, बनिसन जाना, मगर देशों पच्छिम कभी न जाना। क्योकि उघर बहुत बुराई और बहुत खतरा है। खुदा हाफिज ।' यह कहकर बादशाह ने अपने बेटे को रुखसत किया। | " सो शाहजादा घोड़े पर सवार होकर सफर के लिए निकल पड़ा। पहले वह उत्तर की तरफ गया । वह गरियो और सीधे-सादे पहाडी लोगो के साथ रहा और उसने वैसा कि उन्हें अपना पेट मालने के लिए कितनी मेहनत करनी पडती है और वे आधी-तूफान और बरफ का कितनी बहादुरी के साथ मुकाबला करते है। फिर वह दक्षिन की तरफ चला। | " चत्तर में अपने इलाकों के बाद दक्थिन का इलाका उसे बहुत हरा-भर। दिखाई दिया और वहा का मौसम भी अच्छा था। खुबसूरत घाटियों में होकर नविया बह रही हो, खेतों में धान और गेहू के खेत लहलहा रहे थे, पेड फूलों से लदे थे.और अमीन पर से नारियल, आम और अमरूद उठाकर ही आदमी अपना पेट भर सकता । वहा जिन लोगो से बह मिला वै बात बडी नरमी से करते ६ पौर घर आए मेहमान की बडी आवभगत करते थे, लेकिन साथ ही वे

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