दृष्टि पात | Drishti Pat

दृष्टि पात | Drishti Pat

दृष्टि पात | Drishti Pat के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : दृष्टि पात है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Dr. Vishnudutta Agnihotri | Dr. Vishnudutta Agnihotri की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 17.4 MB है | पुस्तक में कुल 130 पृष्ठ हैं |नीचे दृष्टि पात का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | दृष्टि पात पुस्तक की श्रेणियां हैं : literature

Name of the Book is : Drishti Pat | This Book is written by Dr. Vishnudutta Agnihotri | To Read and Download More Books written by Dr. Vishnudutta Agnihotri in Hindi, Please Click : | The size of this book is 17.4 MB | This Book has 130 Pages | The Download link of the book "Drishti Pat" is given above, you can downlaod Drishti Pat from the above link for free | Drishti Pat is posted under following categories literature |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी :
पुस्तक का साइज : 17.4 MB
कुल पृष्ठ : 130

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कोई भी राष्ट्र, राज्य-शासन और समान व्यवस्था की दृष्टि से अथवा जाति-भेद के कारण एक होकर भी अनेक भागों में विभाजित रह सकता है। और इन विभागों में एक या अनेक भाषाओं का प्रचलन भी अहितकर नहीं ! क्योंकि एक विशिष्ट भूभाग के निवासियों की अपनी एक ऐसी भाषा का होना, जिसके द्वारा उस क्षेत्र के वासी भी जातिधर्म या सम्प्रदाय के अनुयायी अपनी विचारधारा को एक दूसरे पर सरलता से प्रदर्शित कर, अनुचित नहीं है। क्योंकि जो व्यक्ति जिस समाज और जाति विशेष में जन्म लेता और नित्य व्यवहृत होता । है, वह उसी समाज या जाति द्वारा मान्य, भाषा में अपने विचारों को अति सुगमता के साथ दूसरों पर प्रकट भी कर सकता है और अन्य सजातीय बन्धुओं की विचारधारा से अवगत भी हो सकता है। परन्तु राष्ट्र में इन सामाजिक जातिगत और प्रादेशिक विभिन्नताओं के रहते हुए भी, समस्त राष्ट्र के निवासियों में विचार साम्य होना भी राष्ट्रीयता की दृष्टि से बहुत आवश्यकीय है। समाज के लिये व्यक्ति का और राष्ट्र के लिए समाज अथवा जाति का, त्याग एक महानता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपने राष्ट्र के प्रति ठीक उतना ही अपितु उससे अधिक उत्तरदायी है, जितना वह स्वतः को अपनी जाति, समाज अथवा प्रदेश के लिये अनुभव करता है ।

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