गृह-प्रबंध शास्त्र | Grah Prabandh Shastra

गृह-प्रबंध शास्त्र : नाथूराम प्रेमी | Grah Prabandh Shastra : Nathuram Premi

गृह-प्रबंध शास्त्र : नाथूराम प्रेमी | Grah Prabandh Shastra : Nathuram Premi के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : गृह-प्रबंध शास्त्र है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Nathuram Premi | Nathuram Premi की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 3.8 MB है | पुस्तक में कुल 176 पृष्ठ हैं |नीचे गृह-प्रबंध शास्त्र का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | गृह-प्रबंध शास्त्र पुस्तक की श्रेणियां हैं : hindu, jyotish

Name of the Book is : Grah Prabandh Shastra | This Book is written by Nathuram Premi | To Read and Download More Books written by Nathuram Premi in Hindi, Please Click : | The size of this book is 3.8 MB | This Book has 176 Pages | The Download link of the book "Grah Prabandh Shastra" is given above, you can downlaod Grah Prabandh Shastra from the above link for free | Grah Prabandh Shastra is posted under following categories hindu, jyotish |


पुस्तक के लेखक :
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पुस्तक का साइज : 3.8 MB
कुल पृष्ठ : 176

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- • परिश्रम ।
( विद्वानोंके वाक्य ।) | जो कुछ मेरे पास है उस पर नहीं, किंतु जो कुछ मैं करता हूँ उस ही पर। मेरा अधिकार है। | उपयोगी श्रम ही ऐसा धन है जो समाजको धनवान् बना सकता है और उसको उन्नत अवस्था पर पहुँचा सकता है। सुलेमानका कथन है कि ऐस; कोई भ्रम नहीं जिसमें लाभ न हो । सम्पत्तिशास्त्र क्या है, केवल इसी सूत्रकी एक विशद और बृहत् व्याख्या है।
प्रकृतिकी आवश्यकताओं को पूरा करनेके लिए परमात्मा किसानों के श्रमसे, शिल्पकारोंके कलाकौशलसे और व्यापारियों के मालसे संसारमें उत्तम वस्तुओं को उत्पन्न करता है। आलसी पुरुष मृतकके समान है जिसको संसारको आवश्यकताओं और परिबर्तनों से कोई सम्बध नहीं। वह केवल समय नष्ट करनेके लिए पशुवत् जीवन व्यतीत करता है; जब आयु पूर्ण हो जाती है कूच कर जाता है । संसारको उसके जीवनसे कोई लाभ नहीं पहुँचता ।
पनतब्ययता सभ्यताके साथ प्रारम्भ हुई । उसकी नींब उस समय
स्थिर हुई जब आजकी जरूरतके साथ कलकी जरूरतका भी खयाल पैदा हुआ । रुपयेके आविष्कारसे बहुत पहले इसका आरम्भ हुआ।
मितव्ययताका अर्थ गृहप्रबन्ध है। गृहप्रबन्धका यह अभिप्राय है कि व्यक्तिगत उन्नति और वृद्धि हो और सामाजिक तथा देशप्रबन्धसे यह तात्पर्य है कि सामाजिक धन-दौलतकी वृद्धि हो ।

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