रामजी जाग उठा | Ramji Jaag Utha

रामजी जाग उठा : दि बा मोकाशी | Ramji Jaag Utha : D. B. Mokashi

रामजी जाग उठा : दि बा मोकाशी | Ramji Jaag Utha : D. B. Mokashi के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : रामजी जाग उठा है | इस पुस्तक के लेखक हैं : D B Mokashi | D B Mokashi की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 1.4 MB है | पुस्तक में कुल 32 पृष्ठ हैं |नीचे रामजी जाग उठा का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | रामजी जाग उठा पुस्तक की श्रेणियां हैं : Stories, Novels & Plays, Uncategorized

Name of the Book is : Ramji Jaag Utha | This Book is written by D B Mokashi | To Read and Download More Books written by D B Mokashi in Hindi, Please Click : | The size of this book is 1.4 MB | This Book has 32 Pages | The Download link of the book "Ramji Jaag Utha " is given above, you can downlaod Ramji Jaag Utha from the above link for free | Ramji Jaag Utha is posted under following categories Stories, Novels & Plays, Uncategorized |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी : ,
पुस्तक का साइज : 1.4 MB
कुल पृष्ठ : 32

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फिर समय भी झूठा लगने लगे, ऐसा कुछ उसे लगने लगा था। अचानक उसके ध्यान में आया कि इतने साल विट्ठल की भक्ति के सहारे वह जी रहा था। जब तक लड़का जीवित था तब तक उसे लगता था कि अपना जीव अलग है, अपने जीने का उद्देश्य अलग है, और लड़के का अलग हैं। लेकिन लड़का चल बसा तो अपना शरीर भी उसे व्यर्थ लगने लगा। उसकी देह मानो एक थैली थी। उसमें रखी चीज के गिरते ही थैली का क्या किया जाये? | किसी कंठीधारी ने कहा था कि रामजी का दुख्ने अहंकार का ही एक रूप था। लेकिन जिस तरह केंबल गांव बारिश से छुटकारा नहीं पा सकता था उसी तरह रामजी भी इस अहंकार से मुक्त नहीं हो सकता था।
ओसारे का दरवाजा खोलकर जोशी दर्जी कब अंदर आया इसका पता रामजी को नहीं लगा। जोशी ने छाता कोने में रखा। लालटेन मुंडेर पर रखी और बात की शुरुआत कैसे की जाये यह न जानने पर पशोपेश में पड़ा वह थोड़ी देर खड़ा रहा। फिर बोला,
'रामजी, लोग आपकी राह देख रहे हैं।" रामजी की न निगाहें उठीं न गर्दन हिली। 'रामजी, उठिये। आज बुधवार है...।''
लेकिन अबकी बार पुकार सुनकर भी रामजी का मन नहीं हुआ कि बात करें। अब जोशी आगे बढ़ा। रामजी के पास जाकर उसके कंधे पर उंगली रखकर बोला,
"रामजी, चलिये। ज्ञानेश्वरी का पाठ करने पर अच्छा लगेगा।'' | रामजी ने मन ही मन कहा, 'अब मुझे किसी बात से अच्छा नहीं लगेगा - किसी से भी नहीं। सब कुछ झूठ है। यह दुनिया झूठी है। मैं झूठा हूँ। ज्ञानेश्वरी और विट्ठल झूठे हैं। हम सब व्यर्थ ही यहां

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