सम्बोधि | Sambodhi

सम्बोधि | Sambodhi

सम्बोधि | Sambodhi के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : सम्बोधि है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Muni Nathmal | Muni Nathmal की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 3 MB है | पुस्तक में कुल 117 पृष्ठ हैं |नीचे सम्बोधि का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | सम्बोधि पुस्तक की श्रेणियां हैं : dharm

Name of the Book is : Sambodhi | This Book is written by Muni Nathmal | To Read and Download More Books written by Muni Nathmal in Hindi, Please Click : | The size of this book is 3 MB | This Book has 117 Pages | The Download link of the book " Sambodhi " is given above, you can downlaod Sambodhi from the above link for free | Sambodhi is posted under following categories dharm |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी :
पुस्तक का साइज : 3 MB
कुल पृष्ठ : 117

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प्रानिक कान में तत्र में अपने को भी मिलना ध्यान है, ऊना चिन-दर्शन के पनि नहीं है। इसका परिजम जितना चाहिए इतना इष्ट गी होता । भन्योधन के लिए TEE ना ४ा, उस स्थि6ि में लगाने का पाया ही नही है का रूप में देता है। IF मा वा नमत्र है पर उभघन के बिना भी शा। र जो है र मन मोह ही इरिगति है। इष्ट-मोह के दर्शन गित होता है पर चारित्र-मीर में प्रचार मिन होता है। दुटि का विकार बना हे वृता स्थिति में तहान भाए तो या मर न माए तो वा । इसीलिए भगवान् ने कहा--भूरि नम्वरु हो–ह न हो तो शान पर होता है, दृष्टि पर नहीं होती, मोह fण नहीं होता तो शान भी अन्य शी होना। फाि कहीं भरा यह है कि हनि के कानोक में दुष्टि गम्भक नहीं होती के काजोन में ज्ञान मर होता है।

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