कलिका पुराण | Kalika Puran

श्रीकलिका पुराण : अज्ञात | Shri Kalika Puran : Unknown

श्रीकलिका पुराण : अज्ञात | Shri Kalika Puran : Unknown के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : कलिका पुराण है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Unknown | Unknown की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 51 MB है | पुस्तक में कुल 442 पृष्ठ हैं |नीचे कलिका पुराण का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | कलिका पुराण पुस्तक की श्रेणियां हैं : dharm, hindu

Name of the Book is : Kalika Puran | This Book is written by Unknown | To Read and Download More Books written by Unknown in Hindi, Please Click : | The size of this book is 51 MB | This Book has 442 Pages | The Download link of the book "Kalika Puran" is given above, you can downlaod Kalika Puran from the above link for free | Kalika Puran is posted under following categories dharm, hindu |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी : ,
पुस्तक का साइज : 51 MB
कुल पृष्ठ : 442

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» नम्र निवेदन
पुराण भारत तथा भारतीय संस्कृति की सर्वोत्तम निधि हैं । थे | अनन्त ज्ञान राशि के भण्डार हैं। इनमें इहलौकिक सुख-शान्ति से युक्त । सफल जीवन के साथ-साथ मानवमात्र के वास्तविक लक्ष्य-परमात्मतत्त्व की प्राप्ति तथा जन्म मरण से मुक्त होने का उपाय और विविध साधन बड़े ही रोचक, सत्य और शिक्षाप्रद कथाओं के रूप में उपलब्ध हैं। इसी कारण पुराणों को अत्यधिक महत्त्व और लोकप्रियता प्राप्त है, परंतु आज ये अनेक कारणों से दुर्लभ होते जा रहे हैं।
| कालिश पुराण की महिमा | जो एक बार भी इस कारिनका पुराण का पाठ करता है वह सभी ॥ कामनाओं को प्राप्त करके अमृतत्व अथति देवत्य को प्राप्त किया करता है । जिससे मन्दिर में यह लिखा हुआ उत्तम पुराण सदा स्थित रहता है, हे हिजो। उसको कभी विघ्न नहीं होता जो पुराण सदा स्थित रहता है, हे द्विजो! उसको कभी विघ्न नहीं होता। जो प्रतिदिन इसका गोपनीय अध्ययन करता है जे कि यह परम तन्त्र हैं । हे द्विज श्रेष्ठों! उसने यहाँ पर ही सम्पूर्ण वेदों क अध्ययन कर लिया है । इस कारण से इससे अधिक अन्य कुछ भी नहीं है । विलक्षण पुरुष इसके अध्ययन से कृतकृत्य हो जाता है।
इसके अध्ययन तथा श्रवण करने वाला पुरुष परम सुखी तथा लोक में बलवान् और दीर्घ आयु वाली भी हो जाता हैं । जो निरन्तर लोक का पालन करता है और अन्त में विनाश करने वाला है। यह सम्पूर्ण भ्रम या अभ्रम से युक्त है मेरा ही स्वरूप है, अतएव उसके लिए नमस्कार हैं । योगियों के हृदय में जिसका प्रपञ्च प्रधान पुरुष हैं, जो पुराणों के अधिपति भगवान् विष्णु और वह भगवान् शिव 'आप सबके ऊपर प्रसन्न हों । जो उग्न हेतु हैं, पुराण पुरुष है, जो शाश्वत तथा सनातन

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