महाभारत की समालोचना तृतीय भाग जय इतिहास | Mahabharat ki Samalochna Tratiya Bhag Jay Itihas

महाभारत की समालोचना तृतीय भाग जय इतिहास | Mahabharat ki Samalochna Tratiya Bhag Jay Itihas

महाभारत की समालोचना तृतीय भाग जय इतिहास | Mahabharat ki Samalochna Tratiya Bhag Jay Itihas के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : महाभारत की समालोचना तृतीय भाग जय इतिहास है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Shripad Damodar Satwalekar | Shripad Damodar Satwalekar की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 03.5 MB है | पुस्तक में कुल 92 पृष्ठ हैं |नीचे महाभारत की समालोचना तृतीय भाग जय इतिहास का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | महाभारत की समालोचना तृतीय भाग जय इतिहास पुस्तक की श्रेणियां हैं : history, Knowledge

Name of the Book is : Mahabharat ki Samalochna Tratiya Bhag Jay Itihas | This Book is written by Shripad Damodar Satwalekar | To Read and Download More Books written by Shripad Damodar Satwalekar in Hindi, Please Click : | The size of this book is 03.5 MB | This Book has 92 Pages | The Download link of the book "Mahabharat ki Samalochna Tratiya Bhag Jay Itihas" is given above, you can downlaod Mahabharat ki Samalochna Tratiya Bhag Jay Itihas from the above link for free | Mahabharat ki Samalochna Tratiya Bhag Jay Itihas is posted under following categories history, Knowledge |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी : ,
पुस्तक का साइज : 03.5 MB
कुल पृष्ठ : 92

Search On Amazon यदि इस पेज में कोई त्रुटी हो तो कृपया नीचे कमेन्ट में सूचित करें |
पुस्तक का एक अंश नीचे दिया गया है : यह अंश मशीनी टाइपिंग है, इसमें त्रुटियाँ संभव हैं, इसे पुस्तक का हिस्सा न माना जाये |

बोध-मनुष्य सदा उत्साह से युक्त रहे, उत्साहके वचन सुने और उत्साह बढानेवाले पुस्तक पढे तथा उत्साही पुरुषों के साथ रहे । शत्रुका प्रतिकार करनेक विषयमें मनुष्य ‘सदा दक्ष रहे और शत्रुका विचार आते ही उसके मन में क्रोध उत्पन्न हो । मनुष्यके ऐसे प्रयत्न हों कि जिससे उसकी गिनती चडे पुरुषों में हो सके। मनुष्य अपने पास सत्र ।साधन ऐसे इकठे करे, कि जिन साधनों से उसका बल बढे, उसका प्रभाव बढे और उसका नाम सुनते ही शत्रुओंको डर उत्पन्न हो। मनुष्य कभी निराश न हो, कितनी भी
आपत्ति क्यों न जाय, मनुष्य अपने भाष्य के लिये आशामय भाव मन में रखे ।

You might also like

Leave A Reply

Your email address will not be published.