महोषध पंडित | Mahoshadh Pandit

महोषध पंडित : भदंत आनंद कौसल्यायन | Mahoshadh Pandit : Bhadant Anand Kausalyayan

महोषध पंडित : भदंत आनंद कौसल्यायन | Mahoshadh Pandit : Bhadant Anand Kausalyayan के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : महोषध पंडित है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Bhadant Anand Kausalyayan | Bhadant Anand Kausalyayan की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 17.7 MB है | पुस्तक में कुल 143 पृष्ठ हैं |नीचे महोषध पंडित का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | महोषध पंडित पुस्तक की श्रेणियां हैं : Stories, Novels & Plays

Name of the Book is : Mahoshadh Pandit | This Book is written by Bhadant Anand Kausalyayan | To Read and Download More Books written by Bhadant Anand Kausalyayan in Hindi, Please Click : | The size of this book is 17.7 MB | This Book has 143 Pages | The Download link of the book "Mahoshadh Pandit" is given above, you can downlaod Mahoshadh Pandit from the above link for free | Mahoshadh Pandit is posted under following categories Stories, Novels & Plays |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी :
पुस्तक का साइज : 17.7 MB
कुल पृष्ठ : 143

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.महौषध पण्डित ये सारी बातें उसने अपने विद्या-जैल से ऐसे बताई मानो दिव्यदृष्टि से देखकर कह रहा हो। | राजा ने यह बात याद रखी। मिथिला के चारों द्वार पर प्राचीन यय मझक, दक्षिणयव मझक और उत्तरयव मभक आदि चार निगम थे। उनमें से प्राचीन यव मञ्झक में श्रीवर्धन नाम का सेठ रहता था। उसकी सुमना देवी नाम की भार्या थी। जिस दिन राजा ने स्वप्न देखा था, उसी दिन बोधिसत्व ने ज्योत्रिश भवन से च्यूत हो उसकी कोख में प्रवेश किया। और भी हुज़ार देव-पुत्रों ने श्योत्रिशभवन से युत हो उसी गांव में सेठ अनुसेठों के कुलों में प्रवेश किया। | इस महीनों के बीतने पर सुमना देवी ने स्वर्ण-वर्ण पुत्र को जन्म दिया। उस समय माक्र ने मनुष्य-लोक की ओर देखते हुए जाना कि बोधिसत्व ने माता की कोख से जन्म ग्रहण किया है। उसने सोचा, इस बुद्धांकुर को सारे सदेव-लोग में प्रकट करना उचित है । जिस समय बोधिसत्व माता की कोख से निकले वह अदृश्य रूप में आया और उनके हाथ पर एक जड़ी-बूटी रख, अपने स्थान को ही चला गया । बोधिसत्व ने उसे मुद्दी में दबा लिया। माँ की कोख से बाहर आते समय उसने माँ को थोड़ा भी दुख नहीं दिया था। जल-पात्र से जल बाहर आने की तरह सुखपूर्वक ही बाहर आया था। | माता ने उसके हाथ में जड़ी देखी तो पुछा, "तात ! क्या मिला है ?
"अम्मा, औषध है।'' कह उसने वह औषध माता के हाथ पर रखी और बोला, "माँ, यह औषध लेकर किसी भी रोग के रोगी को दे ।"
उसने प्रसन्न हो श्रीवर्धन सेठ से यह बात कही। सेठ के सिर में सात वर्ष से दर्द था। वह प्रसन्न हुआ और सोचने लगा—'माता के गर्भ से बाहर आने के समय ही औषध लेकर आया है। पैदाइश के समय ही अम्मा से बातचीत करता है । इस प्रकार के पुण्यवान् द्वारा दी गई औषध बहुत प्रभाव वाली होगी। उसने वह जड़ी ली और पत्थर पर रगड़कर थोड़ी माथे पर लगा ली। सात वर्ष का सिरदर्द कमल के पत्ते से पानी के उड़ जाने की तरह जाता रहा।

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