मानस कौमुदी : कामिल बुल्के हिंदी पुस्तक | Manas Kaumudi : Kamil Bulke Hindi Book

मानस कौमुदी : कामिल बुल्के हिंदी पुस्तक | Manas Kaumudi : Kamil Bulke Hindi Book

मानस कौमुदी : कामिल बुल्के हिंदी पुस्तक | Manas Kaumudi : Kamil Bulke Hindi Book के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : है | इस पुस्तक के लेखक हैं : | की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 5.13 MB है | पुस्तक में कुल 319 पृष्ठ हैं |नीचे का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | पुस्तक की श्रेणियां हैं : dharm, hindu, inspirational

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पुस्तक का साइज : 5.13 MB
कुल पृष्ठ : 319

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प्राक्कथन _ मानस-कौमुदी रामचरितमानस के चुने हुए डेढ सो प्रसगो का संकलन है । इन प्रसगो मे मानस के सबसे कवित्वपूर्ण भागों मे से अधिकतम का समावेश हो गया है तथा प्राय वे सब अश आ गये हैं जो मानसकार की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रसगो के मूल क्रम में कही कोई परिवत्त॑न नहीं किया गया है और उनसे सम्बद्ध जो बत्द रखे गये हैं वे थोडे-ते उदाहुरणो को छोड कर पुरे हैं। कथा के प्रवाह को बनाये रखने के लिए छूटे हुए अशो की विपयवस्तु की सक्षिप्त सुचना कोप्ठको में गद्य मे दे दी गयी है । इससे पाठकों को मानस की पूरी वस्तु के साथ उसके सर्वोत्तम अशो की जानकारी उसके प्राय एक-तिह्ाई आकार के प्रस्तुत संकलन से हो जायेगी । हम यह जानते हैं कि किसी रचना का सक्षेप उसके पूर्ण रूप का स्थान महीं ले सकता भतएव उस दृष्टिकोण का उल्लेख आवश्यक है जिससे प्रेरित हो कर हमने मानस को मानस-कौमुदी का रूप दिया है। हमने अनुभव किया है कि मानस की लोकप्रियता माघुनिक दृष्टि से शिक्षित कहे जाने वाले लोगों के बीच घटती गयी है। साहित्य विपय का अध्ययन करने वाले लोगो में भी ऐसे व्यक्ति कम हैं जिन्होंने सम्पूर्ण मानस पढ़ा हे । जो व्यक्ति इसे पढ़ना चाहते हैं उन्हें पूरी पुस्तक पढ़ने का साहस नही हीता । रचना का विस्तार उनके मार्ग में वाघक प्रमाणित होता है । इसकी लोकप्रियता की एक अन्य वाघा -सम्भवत निर्णयात्मक बाघा-इसकी भाषा है। आज के हि्दी-पाठकों के लिए हिग्दी का प्रघान अर्थ खड़ी बोली है । भतएव जो मवधी या ब्रज-क्षेत्र के नही हैं इस भाषाओ में लिखा हुआ साहित्य उनकी समझ के दायरे से बाहर पड़ता जा रहा है। तीसरा बाघक कारण यह घारणा है कि मानस मध्ययुगीन विचारघारा का प्रतिनिधित्व करने बाली अतः अनाधुनिक रचना है जिसे पढे बिना भी काम चल सकता है । ऐसा समझा जाने लगा है कि वर्णाश्रम धर्म नारी-निन्दा लादि मूल्यहीव विश्वासो के सित्रा इसमे ऐसा कुछ भी नह्दी है जिसे आज का मनुष्य अपने लिए प्रेरणाप्रद समझे । हमने मानस-कौमुदी के माध्यम से इन सभी वाधघाओ को यथासम्भव दर करने का प्रयत्न किया है। हमने न केवल मानस को एक-तिहाई साकार में प्रस्तत किया है बरन्‌ भावश्यक सीमा तक विराम योजक ओर उद्धरण-चिह्नी का समावेश

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