पुनर्नवा | Punarnava

पुनर्नवा | Punarnava

पुनर्नवा | Punarnava के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : पुनर्नवा है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Acharya Hazari Prasad Dwivedi | Acharya Hazari Prasad Dwivedi की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 7 MB है | पुस्तक में कुल 308 पृष्ठ हैं |नीचे पुनर्नवा का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | पुनर्नवा पुस्तक की श्रेणियां हैं : literature

Name of the Book is : Punarnava | This Book is written by Acharya Hazari Prasad Dwivedi | To Read and Download More Books written by Acharya Hazari Prasad Dwivedi in Hindi, Please Click : | The size of this book is 7 MB | This Book has 308 Pages | The Download link of the book " Punarnava " is given above, you can downlaod Punarnava from the above link for free | Punarnava is posted under following categories literature |


पुस्तक के लेखक :
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पुस्तक का साइज : 7 MB
कुल पृष्ठ : 308

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देवति के दील, सौजन्य, कलाप्रेम और विद्वत्ता नै हलद्वीप की जनता का मन मोह लिया था। लोग कानाफूसी किया करते थे कि उनका विरोध सिर्फ एक ही व्यक्ति की ओर से हैं। वह थी हलद्वीप के छोटे नगर की नगरी मंजुला सारे नगर में उसके रूप, शीत, औदार्य और कला-पटुता की धूम थी। बड़े-बड़े प्ठि-कुमार उमके कृपा-कटाक्ष के लिए लालायित रहा करते थे । चरा नप में मादकता थी और कण्ठ में अमृत का रस । हलद्वीप में वह अत्यन्तु अभिमानिनी गणिका के रूप में विख्यात थी और अपने विशाल सतर्खपई हुम्यं के बाहर बहुत कम जाती थी। केवल विशेष-विशेष अवसरों पर प्रायोजित राजकीय उत्सब में वह अपना नृत्यकौशल दिखाया करती थी। अन्य अवसरों पर नृत्य और गीत के प्रेमियों को उमः द्वारस्य होकर ही अपना मनोरथ पूरा करना पड़ता था। उसके अभिमान पर प्रात्मगौरव के सम्बन्ध में लोगों में अनेक प्रकार की किंवदन्तियां प्रचलित थी। कहा तो यह एक जाता था कि कला-चातुरी के बारे में राजा भी उसकी प्रवीचना करने में हिचकते थे ।

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