संक्षिप्त योगवासिष्ठ | Sankhipt Yogvasishtha

संक्षिप्त योगवासिष्ठ : गीता प्रेस | Sankhipt Yogvasishtha : Geeta Press

संक्षिप्त योगवासिष्ठ : गीता प्रेस | Sankhipt Yogvasishtha : Geeta Press के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : संक्षिप्त योगवासिष्ठ है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Geeta Press | Geeta Press की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 51.5 MB है | पुस्तक में कुल 750 पृष्ठ हैं |नीचे संक्षिप्त योगवासिष्ठ का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | संक्षिप्त योगवासिष्ठ पुस्तक की श्रेणियां हैं : dharm, gita-press, hindu

Name of the Book is : Sankhipt Yogvasishtha | This Book is written by Geeta Press | To Read and Download More Books written by Geeta Press in Hindi, Please Click : | The size of this book is 51.5 MB | This Book has 750 Pages | The Download link of the book "Sankhipt Yogvasishtha" is given above, you can downlaod Sankhipt Yogvasishtha from the above link for free | Sankhipt Yogvasishtha is posted under following categories dharm, gita-press, hindu |


पुस्तक के लेखक :
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पुस्तक का साइज : 51.5 MB
कुल पृष्ठ : 750

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पगामें जगत्की असचाका प्रतिपादन भीप्तिमी कहते।-(भुनन्थन् | तः नाश- वाकाशमैं कोई भेद नहीं होता, की प्रकार पदन रूप | कभी नहीं है। मने दुसरे संकल्पका आदिसे युक्त सिमें भी भगका प्रम पर भी म काम थर ना । मम माता । चेटन आगामें स: । स्पन्दन और धर्म नहीं जा प्राग नर विच और विवके किक है। वायु और इफा चन दोनों उदित नहीं है। प्रकारले बुक गद् वैसे ही घिनोन है, जैसे बीजके यदि उदित हों तो भी युद्वारा किये गये इस पूवीके भीतर छ । उक्की हो जाने इसके शरीरले परिभ्रमण बादिको उसके ऊपर स्थित हुए प्राणी सी निकले हुए भाग ग्राकाशने भरे हुए गमनाइके साथ वह नहीं देख पाते हैं, जैसे नौकाके भीतर बैठे र ऐसे मर जाते हैं, जैसे समुदके बल नाके बनके मनुष्य उसकी गतिको नही देखते । ये तीनों लोक साथ मिलकर एक हो जाते हैं। शाशमें गिनान देश, काल, गा तथा अम्गरूप हैं और कार भी मायुके भीतर मून प्राणियोंके प्राण है। इन मानके इन देशा, काल कादिके साथ सम्बन्ध रखनेके कारण देशभर उनका मन है और उस मनके भीतर गको सलाद रूप है। म: देश-कालादिप गए और इसी प्रकार स्थित सो, असे तिल ते छता है। कार मैदन।। अज्ञानीने जिस अर विषघुनन्दन | जैसे गु नि सु -जस से वायी सम्पत्तिको उदय होत है, उस प्रकल शानी निश्चय ही बात है, इसी तरह प्रारम त यहाक उल्लका उदय नहीं है। तन माझामरूपमा अगर उभर ममता से बाये जाते हैं। वैसे मटेक सर्वन्सी बीर बनत ।। सलिये ह पिकप-सम्पत्ति एक मानसे पूसरे स्थानमें पहुँचा देने के भीतर इसका अफस न मोनेके कोण सतरूपा मह है।

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3 Comments
  1. डॉ जयप्रकाश कंसवाल says

    गीता प्रेस की सभी पुस्तकें इनमें निहित गहन ज्ञान को जिस तरह से सरल भाषा में प्रस्तुत किया जाता है वह अदभुत है। साधुवाद आभार धन्यवाद।।

  2. Vikas Kumar says

    मैंने जो संक्षिप्त योगवासिष्ठ खरीदा था उसकी लिखाई अच्छी है लेकिन इस पी डी एफ की लिखाई अच्छी क्यों नहीं है ?

    1. admin says

      प्रकाशन अथवा प्रिंटिंग प्रेस में भिन्नता हो सकती है |

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