अवसान | Avsaan

अवसान : जयनाथ नलिन | Avsaan : Jayanath Nalin

अवसान : जयनाथ नलिन | Avsaan : Jayanath Nalin के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : अवसान है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Jaynath | Jaynath की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 11 MB है | पुस्तक में कुल 127 पृष्ठ हैं |नीचे अवसान का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | अवसान पुस्तक की श्रेणियां हैं : Stories, Novels & Plays

Name of the Book is : Avsaan | This Book is written by Jaynath | To Read and Download More Books written by Jaynath in Hindi, Please Click : | The size of this book is 11 MB | This Book has 127 Pages | The Download link of the book "Avsaan" is given above, you can downlaod Avsaan from the above link for free | Avsaan is posted under following categories Stories, Novels & Plays |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी :
पुस्तक का साइज : 11 MB
कुल पृष्ठ : 127

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आ लो क | कला को साध्य मानने वाले साधको का दल एक समय काफी सब रहा है। उनकी पुकार के साथ अनेक कलाकार बह चले हैं । मौन के व्योम में तिरोहित होती हुई “कला के लिए कला' की वाणी कभी-कभी आज भी सुनाई दे जाती है, पर "कला के लिए कला" वाला भ्रामक सिद्धान्त मुझे कभी नहीं भाया । दृश्य और अदृश्य, समस्त विराट् को मैं कृष्ण मेंमानव में समाया पाता हूं, समस्त को मानब के लिए ही मानता हूँ । कला समस्त से बाहर तो नहीं, तब वह भी मानव के लिए है। ‘मानव के लिए कला' में ही कला की महान् सार्थकता है और सिद्धि भी । कला साध्य नहीं, साधन है । जब यह साधन सिद्धि पाता है या कला जीवन के उत्थान, विकास, अनुरंजन, विश्लेषण, चित्रण, विराटीकरण, आनन्दवर्द्धन में सफल होती है, तब साधन ही साध्य बन जाता है । तब यदि “कला के लिए कला” की घोषणा की जाय तो यह घोषण चुनौती से परे है। कभीकभी कला दमघोट सामाजिक, धार्मिक, नैतिक या राजनीतिक बंधनों में जकड दी जाती है। मानव की मानसिक या भौतिक दासता को स्थापित करने या रखने के लिए कला को दुरुपयोग किया जाता है। ऐसी स्थिति में कला की स्वाधीनता-रक्षा की पुकार सभी ओर से उठाई जाती है। अह पुकार “कला के लिए कला' का नारा बनती हैं, लेकिन यह पुकार परिस्थित-जन्य है, कला का जीवन-सत्य नहीं ।
कला का यही स्वरूप मैं ने इस नाटक में स्वीकृत किया है। यदि कला को यथार्थरूप में समझा जायेगा, तो “कला जीवन के लिये" वाले सत्य में प्रचार, उपदेश, पोस्टरबाज़ी, नारा-साहित्य की गंध कभी आ ही नहीं सकती–साहित्य की त्रिकालातीत व्यापकता और अनन्त मानवता के प्रति

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