दवा | Dawa

दवा : डा. पुनत्तिल कुञ्जब्दुल्ला | Dawa : Dr Punattil Kunjabdulla

दवा : डा. पुनत्तिल कुञ्जब्दुल्ला | Dawa : Dr Punattil Kunjabdulla के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : दवा है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Punattil Kunjabdulla | Punattil Kunjabdulla की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 11.2 MB है | पुस्तक में कुल 254 पृष्ठ हैं |नीचे दवा का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | दवा पुस्तक की श्रेणियां हैं : Stories, Novels & Plays

Name of the Book is : Dawa | This Book is written by Punattil Kunjabdulla | To Read and Download More Books written by Punattil Kunjabdulla in Hindi, Please Click : | The size of this book is 11.2 MB | This Book has 254 Pages | The Download link of the book "Dawa" is given above, you can downlaod Dawa from the above link for free | Dawa is posted under following categories Stories, Novels & Plays |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी :
पुस्तक का साइज : 11.2 MB
कुल पृष्ठ : 254

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जाने कितनी बार मुझे यह अहसास हुआ है कि रचनाकार पुनत्तिल कुजब्दुल्ला के मानस में एक अधुरे इतिहास का रचनाद घुमड़तागुंजता रहा है। 'स्मारक शिकत' (स्मारक शिलाएं ) के रचनाकार (1975) में एक पुरानी मस्जिद और मस्जिद की पृष्ठभूमि में जिंदगी का पूरा मजा लूटते और आखिर दर्दनाक मौत का शिकार होते हुए व्यक्तियों के जीवन की कड़वी मीठी गाथाएं इस इतिहास-संकल्पना को आधार-क्षेत्र दे गयीं। लंपट, भीड़ एवं सबको मदद करने वाला पूक्कोया तंगल जिंदगी और मौत, दोनों में वारादुर साबित हुआ। उस अमर ग्राम-नेता की आश्चर्यजनक जीवन-गाथाएं 'स्मारक शिलकल” की आत्मा हैं। कोपन घर में पटरी की चांदनी रात में गला फाड़-फाड़कर निरंतर रोते, एक कोमल शिशु के लिए एक छोटे आइने में चंदामामा को बांध दिया था। पूकोया तंगत का दुलारी घोड़ा गुलिस्तान की दास्तानों के घोड़े को भाति अपने मालिक के दिल की बात समझकर गजब की तेजी से दाड़ता था। पुजि को बीवी ! यह गोसाई पहाड़ो की घाटी में, निर्जन सागरतट पर एक स्वर्ण-मत्स्य की तरह निर्जीव-सी समुंदर की लहरों द्वारा नापी गयी थी। इन सभी पात्रों ने इस आंचलिक इतिहास को गोरेगा दी है। एक विशेष सागानिक प्रसंग में, उत्तर मलावार के एक देहात की घटनाओं का सिलसिला ही 'स्मारक शिलकल” का मौत है।
कुंगदुल्ला ने इसके पूर्व भी ऐसी कहानियों की रचना की हैं जिनमें अस्पताल के दाशत भरे माहौल में, डाक्टरों व नर्तों की दुनिया के ताने-बाने हास्य के छींटों से चुने गये हैं। यह विषय मलयालम साहित्य में कृतित्व की व्यापक संभावनाओं से भरा है। कुजल्ला इस विषय-वस्तु को आधार बनाने वाले इने-गिने लेखकों में अन्यतम हैं। 'इवा' तक पहुंचते-पहुंचते उनका कैनवास और विशाल हो जाता है; कयामा त्रिविम होते जाते हैं। समस्याओं में लेखक की पैठ और गहरी हो जाती हैं। ‘दवा' की रचना कुंजल्ला के लिए एक तरह से अपनी आत्मा की खोज हैं। इस उपन्यास में अपनी जीविका की आंतरिक अस्मिता पर केंद्रित धर्म अधर्म की विवेचना करते हैं। इस उपन्यास में विचारों के दौरान चिकित्सा विज्ञान की संभावनाओं और सीमाओं पर लंबा शास्त्रार्थ चलता है। साथ ही, आधुनिक युग में चिकित्सा-विज्ञान के विषय में कुछ नैतिक प्रश्नों की चर्चा भी है। उपन्यासकार ने हा. माजा एवं ब्रिगेडियर ताजउद्दीन नामक हो पात्रों को आमने-सामने

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