डॉ. धर्मवीर भारती की कविता – युग दर्शन के परिप्रेक्ष्य में | Dr. Dharmveer Bharati Ki Kavita – Yug Darshan Ke Pariprekshy Mein

डॉ. धर्मवीर भारती की कविता – युग दर्शन के परिप्रेक्ष्य में | Dr. Dharmveer Bharati Ki Kavita – Yug Darshan Ke Pariprekshy Mein

डॉ. धर्मवीर भारती की कविता – युग दर्शन के परिप्रेक्ष्य में | Dr. Dharmveer Bharati Ki Kavita – Yug Darshan Ke Pariprekshy Mein के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : डॉ. धर्मवीर भारती की कविता – युग दर्शन के परिप्रेक्ष्य में है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Shrimati Vibha Shukla | Shrimati Vibha Shukla की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 80.4 MB है | पुस्तक में कुल 263 पृष्ठ हैं |नीचे डॉ. धर्मवीर भारती की कविता – युग दर्शन के परिप्रेक्ष्य में का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | डॉ. धर्मवीर भारती की कविता – युग दर्शन के परिप्रेक्ष्य में पुस्तक की श्रेणियां हैं : literature

Name of the Book is : Dr. Dharmveer Bharati Ki Kavita – Yug Darshan Ke Pariprekshy Mein | This Book is written by Shrimati Vibha Shukla | To Read and Download More Books written by Shrimati Vibha Shukla in Hindi, Please Click : | The size of this book is 80.4 MB | This Book has 263 Pages | The Download link of the book "Dr. Dharmveer Bharati Ki Kavita – Yug Darshan Ke Pariprekshy Mein" is given above, you can downlaod Dr. Dharmveer Bharati Ki Kavita – Yug Darshan Ke Pariprekshy Mein from the above link for free | Dr. Dharmveer Bharati Ki Kavita – Yug Darshan Ke Pariprekshy Mein is posted under following categories literature |


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पुस्तक का साइज : 80.4 MB
कुल पृष्ठ : 263

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किसी भी काव्यधारा का उद्गम प्रथम दृष्टि में चाहे आकस्मिक प्रतीत हो, किन्तु वास्तव में वह आकस्मिक नहीं होता । उसकी पृष्ठभूमि में एक निश्चित सूत्र होता है, एक निश्चित परम्परा होती है । द्विवेदी युग छायावाद का पृष्ठाधार है । इसकी प्रेरणा एवं पृष्ठभूमि में द्विवेदी युग पर्याप्त सीमा तक सहायक था। काव्य क्षेत्र में यह मान्यता है कि एक के बाद दूसरी काव्यधारा का विकास विरोधजन्य होता है । इसी मान्यता के आलोक में छायावाद का जन्म द्विवेदी युगीन इतिवृत्तात्मकता के विरोध में स्वीकारा जाता है । छायावाद अपने पूर्ववर्ती साहित्य से निरपेक्ष नहीं रह सका, यह सत्य छायावादी कवि भी स्वीकारते हैं। महादेवी के शब्दों में नदी के एक होने का कारण पुरातन जल नहीं, नवीन तरंग भंगिमा है ।

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