जीवन देवता की साधना-आराधना | Jeevan Devata Ki Sadhana-Aaradhana

जीवन देवता की साधना-आराधना | Jeevan Devata Ki Sadhana-Aaradhana

जीवन देवता की साधना-आराधना | Jeevan Devata Ki Sadhana-Aaradhana के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : जीवन देवता की साधना-आराधना है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Pt. Shri Ramsharma Acharya | Pt. Shri Ramsharma Acharya की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 2.9 MB है | पुस्तक में कुल 49 पृष्ठ हैं |नीचे जीवन देवता की साधना-आराधना का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | जीवन देवता की साधना-आराधना पुस्तक की श्रेणियां हैं : Spirituality -Adhyatm

Name of the Book is : Jeevan Devata Ki Sadhana-Aaradhana | This Book is written by Pt. Shri Ramsharma Acharya | To Read and Download More Books written by Pt. Shri Ramsharma Acharya in Hindi, Please Click : | The size of this book is 2.9 MB | This Book has 49 Pages | The Download link of the book "Jeevan Devata Ki Sadhana-Aaradhana " is given above, you can downlaod Jeevan Devata Ki Sadhana-Aaradhana from the above link for free | Jeevan Devata Ki Sadhana-Aaradhana is posted under following categories Spirituality -Adhyatm |


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पुस्तक का साइज : 2.9 MB
कुल पृष्ठ : 49

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साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के चार आधार सर्वतोमुखी प्रगति के लिए आवश्यक माने गए हैं। जीवन साधना में स्वाध्याय की, संयमशीलता की और लोकमंगल के लिए निरंतर समयदान, अंशदान लगाते रहने की आवश्यकता पड़ती है। सेवा कार्यों के लिए समयदान, श्रमदान अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं। इसके बिना पुण्य संचय की बात बनती ही नहीं। संयम तो अपने शरीर, मन और स्वभाव में स्वयं भी साधा जा सकता है, पर सेवाधर्म अपनाने के लिए समयदान के अतिरिक्त साधनदान की भी आवश्यकता पड़ती है। उपार्जित आजीविका का सारा भाग पेट परिवार के लिए ही खरच नहीं करते रहना चाहिए, वरन् उसका एक महत्त्वपूर्ण अंश लोकमंगल के लिए भी नियमित और निश्चित रूप से निकालते रहना चाहिए। उपासना, साधना और आराधना को; चिंतन, चरित्र और व्यवहार को परिष्कृत करने की प्रक्रिया को नित्य कार्य में नित्य नियम में सम्मिलित रखना चाहिए। उनमें से किसी एक को यदाकदा कर लेने से काम नहीं चलता। भोजन, श्रम और शयन-ये तीनों ही नित्य करने पड़ते हैं। इनमें से किसी को यदाकदा न्यूनाधिक मात्रा में मनमर्जी से कर लिया जाया करे, तो उस अस्तव्यस्तता के रहते न तो स्वास्थ्य ठीक रह सकता है। और न व्यवस्थित उपक्रम चल सकता है। फिर किसी प्रयोजन में सफल हो सकना तो बन ही किस प्रकार पड़े?

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