जीवन साहित्य अहिंसक नवरचना का मासिक | Jeevan Sahitya Ahinsak Navrachana Ka Masik

जीवन साहित्य अहिंसक नवरचना का मासिक | Jeevan Sahitya Ahinsak Navrachana Ka Masik

जीवन साहित्य अहिंसक नवरचना का मासिक | Jeevan Sahitya Ahinsak Navrachana Ka Masik के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : जीवन साहित्य अहिंसक नवरचना का मासिक है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Yashpal Jain | Yashpal Jain की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 30.56 MB है | पुस्तक में कुल 679 पृष्ठ हैं |नीचे जीवन साहित्य अहिंसक नवरचना का मासिक का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | जीवन साहित्य अहिंसक नवरचना का मासिक पुस्तक की श्रेणियां हैं : literature

Name of the Book is : Jeevan Sahitya Ahinsak Navrachana Ka Masik | This Book is written by Yashpal Jain | To Read and Download More Books written by Yashpal Jain in Hindi, Please Click : | The size of this book is 30.56 MB | This Book has 679 Pages | The Download link of the book "Jeevan Sahitya Ahinsak Navrachana Ka Masik" is given above, you can downlaod Jeevan Sahitya Ahinsak Navrachana Ka Masik from the above link for free | Jeevan Sahitya Ahinsak Navrachana Ka Masik is posted under following categories literature |


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पुस्तक का साइज : 30.56 MB
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सरदार वल्लभभाई को किसी ने लौह पुरुष कहा और किसी ने भारत का विस्मार्क उपमा देने या तुलना करने में एक प्रकार का रस आता है फिर वह उपमा या तुलना ठीक-ठीक वैठती भी हो या नहीं। प्रशंसक और निन्दक दोनों ही अपनी-अपनी रुचि के अनुरूप उपयुक्त-अनुपयुक्त शब्दों का मुक्त प्रयोग करते है। सरदार को भी क्या-क्या नहीं कहा गया है पर उन्होंने तो स्तुति और निन्दा दोनों की सदा उपेक्षा ही की।

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