कुवलयमाला कथा | Kuwlaymala katha

कुवलयमाला कथा : श्रीमद रत्नाप्रभ्सुरी | Kuwlaymala katha : Shrimad Ratnaprabhsuri

कुवलयमाला कथा : श्रीमद रत्नाप्रभ्सुरी | Kuwlaymala katha : Shrimad Ratnaprabhsuri के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : कुवलयमाला कथा है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Shrimad Ratnaprabhsuri | Shrimad Ratnaprabhsuri की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 7.5MB है | पुस्तक में कुल 268 पृष्ठ हैं |नीचे कुवलयमाला कथा का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | कुवलयमाला कथा पुस्तक की श्रेणियां हैं : hindu

Name of the Book is : Kuwlaymala katha | This Book is written by Shrimad Ratnaprabhsuri | To Read and Download More Books written by Shrimad Ratnaprabhsuri in Hindi, Please Click : | The size of this book is 7.5MB | This Book has 268 Pages | The Download link of the book "Kuwlaymala katha" is given above, you can downlaod Kuwlaymala katha from the above link for free | Kuwlaymala katha is posted under following categories hindu |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी :
पुस्तक का साइज : 7.5MB
कुल पृष्ठ : 268

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श्रीरप्रभसूरिविरचिता निर्दयहृदयेन क्षिप्तः ।। अत्र मायादित्य एव समीपवर्ती नान्यः । कथमेतेनास्मि पातितः! । अथवा नैतत् संवादि, दुष्टं मया सङ चिन्तितम् ।।
कदाचिद्वायुना खर्णशैलचूलाऽपि कम्पते ।
उदेयंशुः प्रतीच्यां च, न मित्रं तनुते त्विदम् ॥ १ ॥ धिगहो ! ममापि हृदयस्यानपविकल्पसंकल्पम् । ततः केनापि राक्षसेन वा पिशाचेन वा पूर्ववैरिणा क्षिप्तोऽस्मि ।' स्थाणुरेवं विचिन्त्य खस्यचित्तस्तस्यामप्यवस्थायां तस्यौ । प्रकृतिरेवेशी सजनानाम् । चिन्तितं मायादित्येन-'अहो ! कर्तव्यं तत्तमेव । साम्प्रतं दशानां रत्नानां फलं गृहामि' इति चिन्तयन् मायादित्यो वनान्तः परिभ्रमन् चौरसेनापतिना वीक्षितो धृतथे रत्नानि च गृहीतानि । अथ चौरपतिः कथञ्चिद्भवितव्यतयाऽनन्ययोदन्यया बाधितस्तमेव विशइटावटतटमबाप । समादिष्टं पल्लीखामिना-‘भो भोः ! कूपात्ययः कर्पत' इत्याकर्त्य तैः कूपे पयःकर्षणाय वल्लीवरत्रया प्रावगर्भः पलाशदलपुटकः क्षिप्तः । कूपान्तःस्थेन स्थाणुना तं वीक्ष्य महता शब्देन गदितम्-'केनापि दैवदुर्योगतः कूपेऽत्र क्षिप्तः, ततो मामप्युचारयत ।' तैः सेनानायकस्य पुरो विज्ञप्तम्-‘यत्केनाप्यत्र जीर्णकू पुमानेकः । पातितोऽस्ति ।' सेनापतिना जगदे-‘मो भोः ! अलमलं जलाकर्षण, प्रथमं तमेव वरा* कर्पत ।' ततस्तदादेशवशंवदेस्त्वरितमेव स्थाणुः कूपतः कर्षितः ।' सेनापतिस्तं बभाषे-‘भद्र! कुत्रत्यस्त्वं! कुतः समायातः ! किमभिधानः । कथं जीर्णावटे निपातितः! । भvि.ते चानेन-“देव ! पूर्वदेशत आवां द्वौ जनौ दक्षिणाशामाश्रित्य

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