माण्डूक्य उपनिषद का रहस्य | Mandukya Upanishad Ka Rahasya

माण्डूक्य उपनिषद का रहस्य | Mandukya Upanishad Ka Rahasya

माण्डूक्य उपनिषद का रहस्य | Mandukya Upanishad Ka Rahasya के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : माण्डूक्य उपनिषद का रहस्य है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Swami Madhav Tirthji | Swami Madhav Tirthji की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 434.9 MB है | पुस्तक में कुल 41 पृष्ठ हैं |नीचे माण्डूक्य उपनिषद का रहस्य का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | माण्डूक्य उपनिषद का रहस्य पुस्तक की श्रेणियां हैं : dharm

Name of the Book is : Mandukya Upanishad Ka Rahasya | This Book is written by Swami Madhav Tirthji | To Read and Download More Books written by Swami Madhav Tirthji in Hindi, Please Click : | The size of this book is 434.9 MB | This Book has 41 Pages | The Download link of the book " Mandukya Upanishad Ka Rahasya " is given above, you can downlaod Mandukya Upanishad Ka Rahasya from the above link for free | Mandukya Upanishad Ka Rahasya is posted under following categories dharm |


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पुस्तक का साइज : 434.9 MB
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मुक्तिक उपनिषद में भगवान श्री रामचन्द्रजी हनुमानजी से कहते हैं कि "सिर्फ माण्डूक्य उपनिषद ही मुमुक्षुओं को मुक्ति प्रदान करने में समर्थ है।" ऐसे माण्डूक्य उपनिषद पर श्री गौड़पादाचार्य की कारिकाये हैं।उसपर भगवान श्री शंकराचार्य का भाष्य है।ऐसे उच्चतम उपनिषद का रहस्य खोजकर बड़े बापूजी स्वामी श्री माधवतीर्थ महाराज ने १९५६ के वर्ष में "तुरीय" अथवा "माण्डूक्य उपनिषद का रहस्य" नामक पुस्तक वेदांत आश्रम,वलाद से प्रकाशित किया है।यह पुस्तक उत्तम जिज्ञासुओं और वेदांत में आगे बढे हुए मुमुक्षुओं के लिए उपयोगी होने से परम पूज्य श्री विनुभाई भक्त ने यह पुस्तक छपवाने के लिए स्वामी श्री शिवानंदतीर्थजी ने उनसे विराणी गांव में हुई अंतिम मुलाकात में कहा था। इस पुस्तक पर सत्संग भी उत्तम जिज्ञासुओं की उपस्थिति में अपना स्वास्थ्य ठीक नहीं होने पर भी कुछ दिन देकर जिज्ञासुओं को सच्ची समझ देने का प्रयास किया था। तदुपरांत भाईश्री की अंतिम पुस्तक "भक्तिप्रभा" की छपाई का कार्य चल रहा था। इस अंतिम पुस्तक में भाई श्री ने इस पुस्तक के माध्यम से पांच प्रश्न और उत्तर बनाकर पांच पत्रों के रूपमें किरण ७६ से ८० तक में समावेश भी किया हुआ है।सत्संग प्रेमी भाईश्री को यह पुस्तक बहुत ही पसंद आ गयी थी।इसलिए ही सत्संग करवाया था और छपवाने के लिए जरुरी सूचन भी दिए थे।

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