सामवेद का सुबोध भाष्य | Samved Ka Subodh Bhashya

सामवेद का सुबोध भाष्य : दामोदर सातवलेकर हिंदी पुस्तक | Samved Ka Subodh Bhashya : Damodar Satvalekar

सामवेद का सुबोध भाष्य : दामोदर सातवलेकर हिंदी पुस्तक | Samved Ka Subodh Bhashya : Damodar Satvalekar के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : सामवेद का सुबोध भाष्य है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Damodar Satvalekar | Damodar Satvalekar की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 37.83 MB है | पुस्तक में कुल 633 पृष्ठ हैं |नीचे सामवेद का सुबोध भाष्य का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | सामवेद का सुबोध भाष्य पुस्तक की श्रेणियां हैं : dharm, hindu

Name of the Book is : Samved Ka Subodh Bhashya | This Book is written by Damodar Satvalekar | To Read and Download More Books written by Damodar Satvalekar in Hindi, Please Click : | The size of this book is 37.83 MB | This Book has 633 Pages | The Download link of the book "Samved Ka Subodh Bhashya" is given above, you can downlaod Samved Ka Subodh Bhashya from the above link for free | Samved Ka Subodh Bhashya is posted under following categories dharm, hindu |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी : ,
पुस्तक का साइज : 37.83 MB
कुल पृष्ठ : 633

Search On Amazon यदि इस पेज में कोई त्रुटी हो तो कृपया नीचे कमेन्ट में सूचित करें |
पुस्तक का एक अंश नीचे दिया गया है : यह अंश मशीनी टाइपिंग है, इसमें त्रुटियाँ संभव हैं, इसे पुस्तक का हिस्सा न माना जाये |

(६) गान फरते हैं । छे सामदिकार होते हूं मे इसपरफार है-- घिकार - विदलेषण - विफरषण - अभयास -विराम - सतोभ | १ घिकार- अझे का ओदायि होता है । २ विदछेषण- चीतये फा. वोयि तोया- रद होता है । | खिकषण- ढ ये गका ब यार३यि डड होता 1 ही ४ अभयास- बार बार बोलना जैसे तोयारपि। तोवारयि है । ५ छिराम- जैसे गूणानों हृबयदातये को गुणानोहद । वयदातये ऐसा बोलते है यदयपि मूल संनरमें गणानोदद बपदातये ऐसा रूप महीं है फिर भी गानेके सीफरेके लिए बीचमें ही तोड दिया जाता है इसे विराम कहते हैं । ६ सतोम--ऋषचाओोंमें न जाये हुए अकषरोंकों बोलना । जैसे शो दोचा । दाऊ इतयादि । सामवेद गानरुूप सिसससवेह है पर सामबेद जो आज पुसतकके रुपमें है घह तो केवल चऋचाओंका संगरह है । इनमें एक सी सामगान नहीं है। जिन मंतरॉंकं माघार पर गान होते हैं थे योनिमंतर हैं। भरयात‌ सामबेदके ये मंतर गाये नहीं जाते हैं अपितु इनके जाघार पर घने हुए जो गाने हैं थे गाये जाते हैं । ऋषियोंने इन योनिमंतरॉके माघार पर हजारों गाने बनाये हैं । वे आज सामगान फहे जाते है । सासवेदमें १८७५ मंतर है उन मंतरों पर करोब फरीब ००० सामगान बने है। कौथुमी घालाका यह सामवेद है और इस पर ही चार हजार गानें बने हैं दूसरी प चणायणी शञञाखाका सामवेद दूसरा है मर उन पर भी ४००० गाने पृथक‌ बने हैं। इसपरकार सामवेव अनेक हैं और उसके गाने भी अनेक है। ये सामगान जिस फषिने बचाये उसके नामसे ये गाने जाज भी परसिदध है जैसे गोतमसय परक फदयपरय वारहिप इतयादि । ये सब झामगान जारणयकगान ऊदगान उदयगान आपि नामोंसे मसिदध हैं। सामवेदके मंतर सब शऋगवेदसे ही लिए गए है और करोब ६० मंतर जो ऋगवेदकी अहवलायन धाखामें नहीं मिलते दाशयापन शासामें सिलते है। तातपय यह कि सामवेद छरदेदके मतरॉंका ही संगरह है । अतः सामवेदमें जो मंतर हूं उनके जलाया जो ऋगवेद या लयवंवेदमें मंतर हैं उनका भी गान किया जा सकता है जरथात‌ जितने पादबसमंधर हैं उन सब पर सामगान शन सकते हैं। सामबंदफा खुचोघं गजुवाद मंतर और सामगान झगयेदफे मंतर जो सामयेवमें भाये हे उन पर किस तरहूदे गान चने हैँ घह यहां दियाते है-- जगयेदका मंतर-- अमर आयांहि बीतयें गृणानों हबयदतियें |. नि दोदां सतसि बददिपिं ॥. (के 5१६१० ) सामयेदफा मंतर ( सामयोनिः ) 8 २ 239 २8४ है हे .. 3 ष 3१5 अपर आ याहिं चीतये ख़ृणानों दनयदातये । 2 रे 3.2२ नि दोता सससि बिप ॥ (कर ६९६१० इस मंतरके सामगान-- ( रै) गोतमसय परकमू १ न ०. जे शददर द ड‌ म दे न आंधाहे । आयाहा5३ । वाइताया5र३ । के दरेर शर तोया5२६ । ग़णाना हू । वयदातोया5२३ | शून शे दर 9 तो या5र६ । नाइ होतासाइ२३ । तसाइर३ । डे गजद ञ चाइ२३४ ओह वा । दो5र पी ॥ १ ॥ (२) कदयपसय वारहिंपमू- ४ हर ७९ ५ ज दश न ड‌ अनन आयादि नी । तया३ | गरुणानों दबयदाठा5 ८ अ हर डच रे है के शर हल २३याइ। नि होता सतसि धहो5२ ३३पी । चही 5२ शर 9 हध थयद श‌ दि पर इपाइ२३४ दोवा । चही5३पी5२ ३४५ ॥२॥। ( हे ) गॉतमसय परकस‌ । दण दर आर कक दा च .जरे च अगर आयाहि। चा5न५इतयाइ । यूणानों दजय- ग पर कप न तड कि है | दा5१ ताइ३ये । नि दोठा5२३४सा रसा5- श दर शर पथ २३४ इचा5३ । दा5२३४ इपाइदहा इ। यहां परथम कऋगवेदका एक मंतर दिया है वही मंतर साम बदसें गानेके लिए लिया गया है । यहां सामवेदके अलरोंपर जो अंफ हैं थे अंक उदास भनुदातत जादि सवरमेद दिखाने जो सवर नीचे और ऊपर हैं उरहींको सामवेदमें मंकोंके हारा दिखाया गया है। जो ऋगवेद भवुदास का निवक नीचेकी लकीर (- ) है उसके लिए नके

You might also like

Leave A Reply

Your email address will not be published.