सूरजमुखी का सपना | Suraj Mukhi ka Sapna

सूरजमुखी का सपना : सैयद अब्दुल मलिक | Suraj Mukhi ka Sapna : Saiyyed Abdul Malik

सूरजमुखी का सपना : सैयद अब्दुल मलिक | Suraj Mukhi ka Sapna : Saiyyed Abdul Malik के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : सूरजमुखी का सपना है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Saiyed Abdul Malik | Saiyed Abdul Malik की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 8.8 MB है | पुस्तक में कुल 178 पृष्ठ हैं |नीचे सूरजमुखी का सपना का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | सूरजमुखी का सपना पुस्तक की श्रेणियां हैं : Stories, Novels & Plays

Name of the Book is : Suraj Mukhi ka Sapna | This Book is written by Saiyed Abdul Malik | To Read and Download More Books written by Saiyed Abdul Malik in Hindi, Please Click : | The size of this book is 8.8 MB | This Book has 178 Pages | The Download link of the book "Suraj Mukhi ka Sapna" is given above, you can downlaod Suraj Mukhi ka Sapna from the above link for free | Suraj Mukhi ka Sapna is posted under following categories Stories, Novels & Plays |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी :
पुस्तक का साइज : 8.8 MB
कुल पृष्ठ : 178

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भूमिका
असमिया भाषा में उपन्यास लिखने के प्रयास का आरंभ 'अरुणोदय काल' (ईस्वी 1846-82) में ही हुआ है। अरुणोदय काल में असमिया भाषा ने जिस प्रकार अपने पूर्व स्वरूप को छोड़कर नए स्वरूप को स्वीकारा था, रचना-शली में अभिनवत्व आया था, उसी प्रकार साहित्य में भी एक नए प्रकार के साहित्य के सृजन के लिए द्वार उन्मोचन किया था। वह है उपन्यास साहित्य। बृहत्कथा के समय से ही यद्यपि भारतीय साहित्य में कथा और आख्यानों के लिखने की परंपरा थी, उपन्यास कहने से साहित्य की जो विद्या मानस-पटल में झांकने लगती है, उसे प्रकार का साहित्य उस काल में नहीं रचा गया था। इसलिए, प्राचीन असमिया साहित्य में भी आधुनिक काल के उपन्यास का पूर्व रूप नहीं था। रवींद्रनाथ ठाकुर ने अवश्य ही कहा था कि महाकाव्य और उपन्यास के बीच कोई मौलिक अंतर नहीं है । क्योंकि दोनों ही मूलतः आख्यान का ही वर्णन करते हैं। | अरुणोदय काल में 'जात्रिकर जात्र' नाम से बुनियान के 'पिलग्रिम्स प्रोग्रेस' का भाषांतर हुआ था। (यहां ध्यान देने की बात है कि 'जात्रिक' शब्द का व्यवहार असमिया भाषा में नहीं है; संस्कृत और प्राकृत व्याकरण के अनुसार भी 'जात्रिक शब्द का गठन नहीं हुआ है।)
इनके अलावा इसी काल में ही कामिनीकांत, फुलमनि, आरु करुणा, एलोकेशी बेश्यार कथा, आदि उपन्यास के नाम से कुछ कहानियों का प्रचार हुआ। ये सारे उपन्यास मिशनरियों ने बंगला भाषा में लिखे थे. और बाद में असमिया में अनुवाद कराए थे। कहना न होगा कि ये सारे धार्मिक दृष्टिकोण से लिखित प्रचारात्मक उपदेशप्रधान उपन्यास हैं। इसी काल में प्रकाशित पद्मावती फुकननी का उपन्यास ‘सुधम्र्मार उपाख्यान' इस कोटि की मौलिक रचना है। उपदेश-प्रधान होते हुए भी ‘सुधम्मर उपाख्यान' प्रचारात्मक नहीं है।
दरअसल उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में ही असमिया उपन्यास का आरंभ होता है। सन् 1891 में प्रकाशित श्रीपद्मनाथ गोहांई बरुआ का भानुमती' और उसके ठीक बाद ही प्रकाशित इन्हीं का 'लाहरी' असमिया उपन्यास साहित्य का शिलान्यास समझा जा सकता है। दोनों उपन्यासों के कथानकों को आहोम शासन

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