वयोनिर्णया | Vayoonirnaya

वयोनिर्णया : गणपति शास्त्री | Vayoonirnaya : Ganapatishaastri

वयोनिर्णया : गणपति शास्त्री | Vayoonirnaya : Ganapatishaastri के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : वयोनिर्णया है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Ganapati shaastri | Ganapati shaastri की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 18.7MB है | पुस्तक में कुल 563 पृष्ठ हैं |नीचे वयोनिर्णया का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | वयोनिर्णया पुस्तक की श्रेणियां हैं : dharm

Name of the Book is : Vayoonirnaya | This Book is written by Ganapati shaastri | To Read and Download More Books written by Ganapati shaastri in Hindi, Please Click : | The size of this book is 18.7MB | This Book has 563 Pages | The Download link of the book "Vayoonirnaya" is given above, you can downlaod Vayoonirnaya from the above link for free | Vayoonirnaya is posted under following categories dharm |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी :
पुस्तक का साइज : 18.7MB
कुल पृष्ठ : 563

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णयकारैः, तदपि कन्यायाः युवतिभावमेव गमयति, कुचायववव निपतावेव हि लज्ञापूर्बकवास-परिधानं लोके दृश्यते । अन्यथा हि नव गृ "ऊवं त्रिरात्रान् सम्भवः' इत्यत्र 'त्रिरात्रातूनं सन्नि हित पुण्यदिन सम्भवः संयोगः म्यान्' इनि सम्भवव्यापान मसन म्यान् ॥ नस्मात् द्वितीयालिङ्गदुषणं प्रयुक्तमय वयो निणयकृनां । अम्याने चामरामह कुश्यने ।
यद तृतीयालिङ्गण''गदानृतीयं लिङ्गमुन्यम्त सर्वे
म्यापि गृहामुत्रए विवाह दंपन्याः मधुमांसदर्जन Rजराशन ह्मचर्य च त्रिरात्रमपश्य मनुष्यं इति विधीयन। विधानम्
व ब्रह्मवयवधान विमृश्यमानं तुमत्या एव खि
या विवाह प्रन्याययति । ब्रह्मचर्य हि मधुनाऽसमानग्ण इत्याग्भ्य 'ह-नवम् अम्मम्प्रदाय विद्भिः बालिशः सच्दछ.बाणां अपाकर पेन मयां ताक कुली त्रिवन । नम्मान गृहमूत्रषु त्रि रात्र प्राचयवधान विधायाः कनुमनीव न्टिङ्गमिति अनन्तपि ‘नमनत्" इत्यन्लेन ग्रन्थन । अम्प ने ग्राम्य अयमभिप्रायः ।
*गृहात्रेषु विगवादि ब्राह्मचर्पावधान नाऽपश्य विद्या कन्या तुमना गमगेन्नादि कश्चिदनिकामी पुमान् म्वन सार्क एकशव्याशायिनीं बालिकामयुपभोक्तुमारभन, तन्माभूदिति। "म्मरण, कीर्तन, के 'लिः, प्रेक्षण, गुयभापणं, मन्योऽध्ययमावध क्रियानिवृत्तिग्य च' इत्युक्त मधुनाई विशप वर्जनार्थ च । वाम्नु अयुवत्याः नाप सक्यभावेऽपि ब्रह्मचर्यपगम्य मधुमपाइन्नधाचन, अञ्जन, अभ्य अन, अनुलेपन, स्नग्धारण, वर्तनाथमच ॥ तस्मान्नदं ब्रापचयविध। नमवलम्य दृएर जस एव कन्याया विवाहाता गृहदभिप्राय इति साधनमुपफ्नं स्यात्' इति ॥

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