विचार और वितर्क | Vichar Aur Vitark

विचार और वितर्क | Vichar Aur Vitark

विचार और वितर्क | Vichar Aur Vitark के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : विचार और वितर्क है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Acharya Hazari Prasad Dwivedi | Acharya Hazari Prasad Dwivedi की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 19 MB है | पुस्तक में कुल 266 पृष्ठ हैं |नीचे विचार और वितर्क का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | विचार और वितर्क पुस्तक की श्रेणियां हैं : Spirituality -Adhyatm

Name of the Book is : Vichar Aur Vitark | This Book is written by Acharya Hazari Prasad Dwivedi | To Read and Download More Books written by Acharya Hazari Prasad Dwivedi in Hindi, Please Click : | The size of this book is 19 MB | This Book has 266 Pages | The Download link of the book " Vichar Aur Vitark " is given above, you can downlaod Vichar Aur Vitark from the above link for free | Vichar Aur Vitark is posted under following categories Spirituality -Adhyatm |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी :
पुस्तक का साइज : 19 MB
कुल पृष्ठ : 266

Search On Amazon यदि इस पेज में कोई त्रुटी हो तो कृपया नीचे कमेन्ट में सूचित करें |
पुस्तक का एक अंश नीचे दिया गया है : यह अंश मशीनी टाइपिंग है, इसमें त्रुटियाँ संभव हैं, इसे पुस्तक का हिस्सा न माना जाये |

उन दिनों भारतवर्ष के शास्त्रज्ञ विद्वान् निबन्ध रचना में जुटे हुए थे । उन्होंने प्राचीन भारतीय परम्परा को शिरोधार्य कर लिया था,—अर्थात् सब कुछ को मानकर, सब के प्रति आदर का भाव बनाए रखकर, अपना रास्ता निकाल लेना । सगुण भाव से भजन करने वाले भक्त लोग भी सम्पूर्ण रूप से इसी पुरानी परंपरा से प्राप्त मनोभाव के पोषक थे। वे समस्त शास्त्री और मुनिजनी को अकुंठ चित्त से अपना नेता मानकर उनके वाक्यों की संगति प्रेम-पक्ष में लगाने लगे । इसके लिये उन्हें मामूली परिश्रम नहीं करना पड़ा । समस्त शास्त्रीका प्रेम-भक्तिमूलक अर्थ करते समय उन्हें नाना अधिकारियों और नाना भजन-शैलियों की आवश्यकता स्वीकार करनी पड़ी, नाना अवस्था र अवसर की कल्पना करनी पड़ी, और शास्त्र-ग्रन्थों के तारतम्य की भी कल्पना करनी पड़ी। साविक, राजसिक और तामसिक प्रकृति के प्रस्तार-विस्तार से अनन्त प्रकृति के भक्तों श्रीर अनन्त प्रणाली के भजनों की कल्पना करनी पड़ी । सबको उन्होने उचित मर्यादा दी श्रीर यद्यपि अन्त तक चलकर उन्हें भागवत महापुराण को ही सर्व-प्रधान प्रमाण ग्रन्थ मानना पड़ा था, पर अपने लम्बे इतिहास में उन्होंने कभी भी किसी शास्त्र के सम्बन्ध में अवज्ञा या अवहेला का भाव नहीं दिखाया । उनकी दृष्टि बराबर भगवान् के परम प्रेममय रूप और मनोहारिणी लीला पर निबद्ध रही, पर उन्होंने बड़े धैर्य के साथ समस्त शास्त्रों की सड़ति लगाई । सगुण भाव के भक्तों की महिमा उनके असीम धैर्य और अध्यवसाय में है, पर निर्गुण श्रेणी के भक्तों की महिमा उनके उत्कट साहस में है । एकने सब कुछ को स्वीकार करने का अद्भुत धैर्य दिखाया, दूसरे ने सब कुछ छोड़ देने का असीम साहस ।

You might also like

Leave A Reply

Your email address will not be published.