अपने इसी शहर में | Apne Isi Shahar Me

अपने इसी शहर में : कविता संकलन – डॉ रामकिशन सोमानी हिंदी पुस्तक | Apne Isi Shahar Me : Poem Collection – Dr. Ramkishan Somani

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इस पुस्तक का नाम : अपने इसी शहर में है | इस पुस्तक के लेखक हैं : ramkishan somani | ramkishan somani की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 1.75 MB है | पुस्तक में कुल 98 पृष्ठ हैं |नीचे अपने इसी शहर में का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | अपने इसी शहर में पुस्तक की श्रेणियां हैं : Poetry, Uncategorized

Name of the Book is : Apne Isi Shahar Me | This Book is written by ramkishan somani | To Read and Download More Books written by ramkishan somani in Hindi, Please Click : | The size of this book is 1.75 MB | This Book has 98 Pages | The Download link of the book "Apne Isi Shahar Me" is given above, you can downlaod Apne Isi Shahar Me from the above link for free | Apne Isi Shahar Me is posted under following categories Poetry, Uncategorized |


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पुस्तक का साइज : 1.75 MB
कुल पृष्ठ : 98

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अपने इसी शहर में की कविताओं का आकाश उतना ही है जितना शहर का फैलाव है । इसमें वह अंतरिक्ष भी समाहित है जो मुझे इस छोटे से आकाश के पार दिख गया है 1 शहरी मानसिकता इन कविताओं में सभी जगह विद्यमान है। सभी शहर एक जैसी मानसिकता में जी रहें हैं । उनका देश उनका परिवेश उनका आकाश उनका विकास एक ही है और ये सब संवेदी मन को एक साथ प्रभावित करते हैं । अनुभूति सामाजिक बुद्धि- क्षमता तथा पररपर सर्बधों के निर्वाह में व्यक्ति व स्थानीयता के कारण इस प्रभाव को ग्रहण करने तथा उसे अभिव्यक्त करने में थोडा बहुत अंतर आ जाता है किंतु सोच के अंतर्प्रवाह में यह फर्क बहुत नही होता । इसलिए आकाश का फैलाव भले ही अपने शहर जितमा हो लेकिन वह दूसरे शहर के आकाश से भिन्न नहीं होता । शहरों के आधार पर आकाश को खण्ड-खण्ड किया भी नहीं जा सकता । अपने इसी शहर का आकाश भी कोई अलग खण्ड नहीं समग्र फैलाव के साथ एकाकार है । अनुभूति की यह विवशता है कि वह अभिव्यक्ति में उस गहराई को नहीं प्राप्त कर पाती जो उसमें होती है । भाषा व शिल्प की कमजोरी उसका वांछित साथ नहीं दे पाती । अभिव्यक्ति व्यक्ति की क्षमता भी है और सीमा भी। इसको निरंतर बनाये रखना ही इसका विकास है । यह काव्य संग्रह इसी इच्छा का परिणाम है । शहर के कई चेहरे होते हैं । वे सभी डरावने नहीं होते हैं । यह अलग बात है कि मुझे ये भयावने चेहरे ही बार-बार दिखे और शहर की आतंकित करने वाली छवि ही मेरे अंतर पर अंकित होती गई यही मेरा यथार्थ बन गई। कविता में यही छवि उतर आई 1 दूसरी छवि भले ही विद्यमान हो किंतु वर्तमान का सत्य यही है कि मनुष्य की संवेदनाओं का क्षरण हो रहा है और तंत्र व्यवस्था निरंतर दुष्ट हो रही है । ये स्थितियाँ कविता की समाधि को बार बार भंग करती हैं विचलित करती हैं । यह विचलन बहुत पीड़ाकारक है अभिव्यक्ति के स्तर पर निर्वल व निरीह भी है । कविताओं में साथ ही व्यक्ति भ

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