भटके हुए लोग | Bhatke Hue Log

भटके हुए लोग : हरचरण चावला | Bhatke Hue Log : Harcharan Chawla

भटके हुए लोग : हरचरण चावला | Bhatke Hue Log : Harcharan Chawla के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : भटके हुए लोग है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Harcharan Chawla | Harcharan Chawla की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 10.3 MB है | पुस्तक में कुल 186 पृष्ठ हैं |नीचे भटके हुए लोग का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | भटके हुए लोग पुस्तक की श्रेणियां हैं : Stories, Novels & Plays

Name of the Book is : Bhatke Hue Log | This Book is written by Harcharan Chawla | To Read and Download More Books written by Harcharan Chawla in Hindi, Please Click : | The size of this book is 10.3 MB | This Book has 186 Pages | The Download link of the book "Bhatke Hue Log" is given above, you can downlaod Bhatke Hue Log from the above link for free | Bhatke Hue Log is posted under following categories Stories, Novels & Plays |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी :
पुस्तक का साइज : 10.3 MB
कुल पृष्ठ : 186

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जो फिर भी अपने हैं, वे मुझे जगह-जगह मिले। चेहरे बदल-बदल कर मिले। तुम कहानीकार हो, हमारा जीवन भी यहां साक्षात कहानी है। वहां हमने औरत की पिंडली देखी और अपनी जिंदगी भर की तपस्या भंग कर ली। यहां औरत खुलकर सामने आती है तो सोचो, हमारी क्या हालत होती होगी ! हम नहीं कहते कि तुम हमारी कहानियों से लोगों को मानसिक यातना दो। तुम कहानीकार के रूप में यह करना भी नहीं चाहोगे, क्योंकि तुम दर्पण हो, जैसा देखते हो दिखा देते हो। मगर क्या हम तुम्हारे दर्पण में प्रतिबिंबित नहीं हो सकते ? हम जो मिट्टी की संतान हैं, मगर जिन्हें वषों अपनी मिट्टी के दर्शन नसीब नहीं होते। क्या तुम्हें, हममें कोई कहानी नजर नहीं आती?
कहीं एक जगह इंतजार हुसैन ने लिखा है, “मैंने औरत को जितना देखा है। उतना ही लिखा है।'' में भी यही कहता हूँ। पात्रों, औरतों, परिस्थितियों और इस नए वातावरण को मैंने जितना देखा है, मैंने उतना ही लिखा है। अब इस जितने-जितने में जितना अंतर है, वह दूसरी जगहों और दूसरी प्रकार की नजरों के कारण है।
मुझे इस समय दिल्ली में अपने घर में मेज पर पड़े दर्पण और उसे आकर देखने वाली चिड़िया की याद आ रही है। वह हर रोज दर्पण के सामने आकर बैठती थी, अपने प्रतिबिंब पर चोंचे मारती थी और मेरे पास पहुंच जाने पर भी अपने इश्क से बाज नहीं आती थी। मगर एक दिन जब वह दर्पण के पीछे पहुंच गई और दृश्य दूसरा देखा तो उस पर वास्तविकता प्रगट हो गई और वह प्रतिबिंबित इश्क से आजाद हो गई। जाने कब हम लोग भी झूठी शान-शौकत, मरीचिका और साए से आजाद होंगे, और वापस अपनी मिट्टी के बुलावे पर कान धर सकेंगे ! मगर एक मुश्किल भी है कि इंसान पास की वास्तविकता को हाथ लगाकर, परख और बरत कर देखना चाहता है और जब वह छाया सिद्ध होती है तो दिल यू टूटता है कि उसे जोड़ना मुश्किल हो जाता है। फिर पलायन में शरण लेना पड़ता है। मरीचिका में कम से कम आस तो छुपी होती है। ओस्लो (नार्वे)
-हरचरन चावला

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