बिहार के कटिहार प्रखण्ड में भूमि उपयोग परिवर्तन प्रतिरूप | Bihar Ke Katihar Prakhand Mein Bhumi Upyog Parivartan Pratiroop

बिहार के कटिहार प्रखण्ड में भूमि उपयोग परिवर्तन प्रतिरूप | Bihar Ke Katihar Prakhand Mein Bhumi Upyog Parivartan Pratiroop

बिहार के कटिहार प्रखण्ड में भूमि उपयोग परिवर्तन प्रतिरूप | Bihar Ke Katihar Prakhand Mein Bhumi Upyog Parivartan Pratiroop के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : बिहार के कटिहार प्रखण्ड में भूमि उपयोग परिवर्तन प्रतिरूप है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Deen Bandhu | Deen Bandhu की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 34.3 MB है | पुस्तक में कुल 440 पृष्ठ हैं |नीचे बिहार के कटिहार प्रखण्ड में भूमि उपयोग परिवर्तन प्रतिरूप का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | बिहार के कटिहार प्रखण्ड में भूमि उपयोग परिवर्तन प्रतिरूप पुस्तक की श्रेणियां हैं : Social

Name of the Book is : Bihar Ke Katihar Prakhand Mein Bhumi Upyog Parivartan Pratiroop | This Book is written by Deen Bandhu | To Read and Download More Books written by Deen Bandhu in Hindi, Please Click : | The size of this book is 34.3 MB | This Book has 440 Pages | The Download link of the book "Bihar Ke Katihar Prakhand Mein Bhumi Upyog Parivartan Pratiroop" is given above, you can downlaod Bihar Ke Katihar Prakhand Mein Bhumi Upyog Parivartan Pratiroop from the above link for free | Bihar Ke Katihar Prakhand Mein Bhumi Upyog Parivartan Pratiroop is posted under following categories Social |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी :
पुस्तक का साइज : 34.3 MB
कुल पृष्ठ : 440

Search On Amazon यदि इस पेज में कोई त्रुटी हो तो कृपया नीचे कमेन्ट में सूचित करें |
पुस्तक का एक अंश नीचे दिया गया है : यह अंश मशीनी टाइपिंग है, इसमें त्रुटियाँ संभव हैं, इसे पुस्तक का हिस्सा न माना जाये |

मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु भूमि का उपयोग विविध रूपों में करता है । भूमि संबंधी इस प्रकार के उपयोग के फलस्वरूप अनेक समस्याएँ और अधिक बढ़ जाती है । जनसंख्या वृद्धि के फलस्वरूप मृदा की उत्पादकता में हृास की समस्या और गम्भीर हो जाती है । अत मानव-कल्याण हेतु भूमि- उपयोग में परिवर्तन आवश्यक एवं अपरिहार्य हो जाता है, जिसके लिए वर्तमान एवं सम्भाव्य भूमि उपयोग का मूल्यांकन अनिवार्य है । भूमि- उपयोग संकल्पना मुख्यतः किसी प्रदेश में प्राप्त संसाधनों आवश्यकताओं और प्रयत्नों के मध्य निरन्तर अन्तक्रियाओं का प्रतिफल है तथा भूमि-प्रबन्ध की कुशलता अथवा अकुशलत का विकास एवं विनाश दोनों ही सम्भव है ।

You might also like

Leave A Reply

Your email address will not be published.