गायत्री साधना और यज्ञ प्रक्रिया | Gayatri Sadhana Aur Yagya Prakriya

गायत्री साधना और यज्ञ प्रक्रिया | Gayatri Sadhana Aur Yagya Prakriya

गायत्री साधना और यज्ञ प्रक्रिया | Gayatri Sadhana Aur Yagya Prakriya के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : गायत्री साधना और यज्ञ प्रक्रिया है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Pt. Shri Ram Sharma Acharya | Pt. Shri Ram Sharma Acharya की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 1.7 MB है | पुस्तक में कुल 49 पृष्ठ हैं |नीचे गायत्री साधना और यज्ञ प्रक्रिया का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | गायत्री साधना और यज्ञ प्रक्रिया पुस्तक की श्रेणियां हैं : Granth

Name of the Book is : Gayatri Sadhana Aur Yagya Prakriya | This Book is written by Pt. Shri Ram Sharma Acharya | To Read and Download More Books written by Pt. Shri Ram Sharma Acharya in Hindi, Please Click : | The size of this book is 1.7 MB | This Book has 49 Pages | The Download link of the book "Gayatri Sadhana Aur Yagya Prakriya" is given above, you can downlaod Gayatri Sadhana Aur Yagya Prakriya from the above link for free | Gayatri Sadhana Aur Yagya Prakriya is posted under following categories Granth |


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पुस्तक का साइज : 1.7 MB
कुल पृष्ठ : 49

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सांस के लिए केवल आक्सीजन ही काफी नहीं-हवा में रहने वाले पूलिकणों का विद्युत आवेश ऋणात्मक होना भी आवश्यक है । सर्वविदित है कि वायु में छोटे-छोटे धूलिकण भरे रहते हैं । इन आवेश कणों को 'आयन' कहा जाता है । घनात्मक आवेश वाले स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते हैं और ऋणात्मक कण श्रेयस्कर सिद्ध होते हैं । जिस प्रकार स्वास्थ्य वर्धक जलवायु प्राप्त करने की व्यवस्था स्वस्थ जीवन के लिए। आवश्यक समझी जाती है । उसी प्रकार अब विशेषज्ञ लोग यह भी सुझाव देते हैं कि ऐसी जगह रहना चाहिए जहाँ वायु में रहने वाले ऋणात्मक विद्युत से आवेशित हो । प्रयास यह किया जा रहा है कि वायु में आवेश नियंत्रित करके बिगड़े स्वास्थ्य को सुधारने की, रोगों के निवारण की व्यवस्था की जाय । इस संदर्भ में काफी खोजें हुई हैं और अभीष्ट आवेश उत्पन्न करने की एक नई प्रक्रिया 'आयनिक थेरेपी" और भी सम्मिलित कर ली गई है । फेंफड़ों से सम्बन्धित स्वांस रोग पर तथा रक्त संचार प्रक्रिया में दोष होने के कारण उत्पन्न हुए रोगों के उपचार में इस पद्धति का आश्चर्यजनक परिणाम देखने को मिल रहा है।

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