करुनायतन | Karunayatan

करुनायतन : ओमप्रकाश खण्डेलवाल | Karunayatan : Omprakash Khandelwal

करुनायतन : ओमप्रकाश खण्डेलवाल | Karunayatan : Omprakash Khandelwal के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : करुनायतन है | इस पुस्तक के लेखक हैं : | की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 2.2 MB है | पुस्तक में कुल 49 पृष्ठ हैं |नीचे करुनायतन का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | करुनायतन पुस्तक की श्रेणियां हैं : Poetry

Name of the Book is : Karunayatan | This Book is written by | To Read and Download More Books written by in Hindi, Please Click : | The size of this book is 2.2 MB | This Book has 49 Pages | The Download link of the book "Karunayatan" is given above, you can downlaod Karunayatan from the above link for free | Karunayatan is posted under following categories Poetry |


पुस्तक की श्रेणी :
पुस्तक का साइज : 2.2 MB
कुल पृष्ठ : 49

Search On Amazon यदि इस पेज में कोई त्रुटी हो तो कृपया नीचे कमेन्ट में सूचित करें |
पुस्तक का एक अंश नीचे दिया गया है : यह अंश मशीनी टाइपिंग है, इसमें त्रुटियाँ संभव हैं, इसे पुस्तक का हिस्सा न माना जाये |

करुणायतन के सम्बन्ध में
करुणायतन मानव-मन को सहज रागात्मक अनुभूतियों को चित्रित करने वाला एक प्रगति-काव्य है । यह प्रेम-सम्बन्धों से :सूरा होने माग इन्द्रधनुषी मनोभानों का प्रतिबिम्बन करता है। इस एति में संयोग-वियोग और राग-विराग के संघर्षपूर्ण अंतर्द्वन्द्व की अभिव्यक्ति रूपायित हुई हैं। प्रस्तुत काव्य में, कहीं खिलखिलाता हुआ सवेरा मिलेगा तो कहीं शाम का सन्नाटा, कहीं मन को गुदगुदाती हुई वा सो सँगड़ाई मिलेगी तो कहीं
बडबाई अखिों वाली अदास साँझ, फहीं मीठी-मीठी धूप होगी तो कौं काँटों सी कसकती छाया, कहीं स्नेह की सरस फुहारें होंगी तो कहीं यंत्रणा दायक आप से अखरते वियोग के क्षण होंगे, कहीं वीरों सी चुभती हुई रिमझिम बरसातें मिलेंगी तो कहीं समर्पण की सुगंध से नहाते हुए क्षण मिलेंगे परन्तु सभी अभिव्यक्ति के लिए विवश मनोभावों को व्यक्त करते हुए मिलेंगे। | हमारे शास्त्रों में चचत पुरुषार्थ-चतुष्ट्य में धर्म को बाधार, मोक्ष को साध्य, अर्थ और काम को साधन के क्षेप में प्रतिष्ठित किया गया है। माम मनुष्य के स्वभाव का अभिन्न अंग है। काम से असंपृक्त व निलिप्त प्रागी की कल्पना लौकिक धराक्ष पर संभव नहीं है । श्रीमद्भगवद्गीता में अनासक्ति को पोलित करने वाली निष्कामता में भी काम को मानन के स्वभाव लक्षण की स्थीति प्रदान की गयी है। कामना एथ आसक्ति रजोगुण के, कारण और परिणाम दोनों है। बीज और वृक्ष की भाँति कामना और रजोगुण का परस्सर अन्योन्याश्रित संबंध हैं।
॥ तीन ||

You might also like

Leave A Reply

Your email address will not be published.