राजस्थान के तीर्थ | Rajasthan Ke Teertha

राजस्थान के तीर्थ : परमेश्वर द्विरेफ | Rajasthan Ke Teertha : Parmeswar Dviref

राजस्थान के तीर्थ : परमेश्वर द्विरेफ | Rajasthan Ke Teertha : Parmeswar Dviref के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : राजस्थान के तीर्थ है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Parmeswar Dviref | Parmeswar Dviref की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 2.5 MB है | पुस्तक में कुल 126 पृष्ठ हैं |नीचे राजस्थान के तीर्थ का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | राजस्थान के तीर्थ पुस्तक की श्रेणियां हैं : dharm, hindu, history, india, Knowledge

Name of the Book is : Rajasthan Ke Teertha | This Book is written by Parmeswar Dviref | To Read and Download More Books written by Parmeswar Dviref in Hindi, Please Click : | The size of this book is 2.5 MB | This Book has 126 Pages | The Download link of the book "Rajasthan Ke Teertha" is given above, you can downlaod Rajasthan Ke Teertha from the above link for free | Rajasthan Ke Teertha is posted under following categories dharm, hindu, history, india, Knowledge |


पुस्तक के लेखक :
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पुस्तक का साइज : 2.5 MB
कुल पृष्ठ : 126

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भैरझुनू जिले में जैसे नरहड़ फा पोर प्रसिद्ध है उसी प्रकार उदमपुरवाटी में कैद का पोर प्रसिद्ध है। यह स्थान एक बड़ी इमारत में है इरा के पास ही एक बड़ी बावड़ी है जो अब एक पोर से दूट चुकी है । कैड के पीरवी के
धन्य में कई प्रकार की जनश्रुतियो सुनने में आई हैं। सारांश यह है कि केर में नवाब पार्टी का ममगई नामक एक भाजा पा, मामाद ने विवाह नहीं किया, उसे घोड़े पर भड़ने का बड़ा शौक था। वह अपने आपकी पादान समझता था । किन्तु किसी के ताना मार देने पर गनीमहगए गे गेष्ट में सं० १५२० वि० में नौविसमट्टी ने सो । पुजारी पीर का नाम "सरगीमिय'" बताते है । मुर्गा जाता है कि जीवित-गट्टी मैने नो बाद मालकों को गोप्नो (बताए।) दिया करता था। शायद जो रो इरा पीर का नाम "शीनोमियो'" पड़ गया हो। पीरजी को सप्र पर नवाद द्वारा पका मन बना दिया गया, जो पा भी वर्तशान है। पोरकी के स्थान में मुरा| मानीं तगा केपि भाइयों ने कई तिबारे तया रसोइयां बनादी हैं। पग दरगाह | के सामने संगमरमर का फर्श भी दियों द्वारा बना दिया गया है ।
भोलारामजी केडिया के कोई पुष नही था । पोरजी के स्थान पर एक टिस्ते पर एक फोर रहता था। भोलारामजी है फकीर के पास पहुंच कर पुर प्रति की इच्छा प्रभट की। पकर के बरवान से इन पुश हुमा जिका नाम हैदराज के नाम से प्रतिज्ञा । फकीर ने वारं रह थी कि तुम्हे एक - मीठे पानी को कुई बनानी होगी तथा जन्मे तथा ब्याहे 'शौरनी पीर' की। ५ जात देनी होगी। उसी दात के पापार पर उन्होने एक कुई बगवाई त्रिको शरीमुई के माम से पुकारते हैं। जरा सुगम से कर पाने तक केडिया नाई चाहे कितनी ही दूर क्यों न रहें त-जा के लिये भेड़ पाते रहते हैं। सौरानोमय को पीर हुपे २२५ वर्षे हो कि है। भादमा वदो - के दिन प्रतिवर्ष मेला भी लगता है।

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