साधना के पथ पर | Sadhana Ke Path Par

साधना के पथ पर | Sadhana Ke Path Par

साधना के पथ पर | Sadhana Ke Path Par के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : साधना के पथ पर है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Shri Haribhau Upadhyay | Shri Haribhau Upadhyay की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 15 MB है | पुस्तक में कुल 260 पृष्ठ हैं |नीचे साधना के पथ पर का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | साधना के पथ पर पुस्तक की श्रेणियां हैं : Spirituality -Adhyatm

Name of the Book is : Sadhana Ke Path Par | This Book is written by Shri Haribhau Upadhyay | To Read and Download More Books written by Shri Haribhau Upadhyay in Hindi, Please Click : | The size of this book is 15 MB | This Book has 260 Pages | The Download link of the book "Sadhana Ke Path Par" is given above, you can downlaod Sadhana Ke Path Par from the above link for free | Sadhana Ke Path Par is posted under following categories Spirituality -Adhyatm |


पुस्तक के लेखक :
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पुस्तक का साइज : 15 MB
कुल पृष्ठ : 260

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इस ढांचे का विचार छोड़ दें व इसके निवासी, इसके मालिक, का विचार करें तो फिर व्यष्टि व समष्टि ये दो अलग नहीं रह जाते । ‘साधना के पथ पर यह व्यग्नि-प्रधान, अपनी तरफ इशारा करने वाला, नाम रक्खा तो क्या, व अहिंसा के अनुभव" यह समष्टि-प्रधान, पाटको को कुछ देने की इच्छा सूचित करने वाला नाम रक्खा तो क्या, एक ही बात है । जब कुछ न कुछ करता ही रहता है । वह अपने मूलरूप को न भूल कर जो कुछ भी करता है व करेगा वह सव शुभ व जायज ही होगा । जीव जब यह भूल जाता है कि मैं विशुद्ध परमात्मा का एक अंश हैं; वे इस जड़ देह के ढांचे में अपनेपन को खत्म कर देता है तभी वह अपने वे समाज के लिए दूपित ३ भयङ्कर हो जाता है, तभी उसकी चिन्ता, क्रिया सत्र शोचनीय हो जाती है। अतः यदि मनुष्य अपने ढांचे व उसके स्वामी जीवात्मा-की इस पृथकूता को समझ कर शरीर की अपेक्षा सदैव प्रात्मा की आवश्यकता का ध्यान रखे, तो फिर उसकी दृष्टि अपनी अर रही क्या व जगत की ग्रोर रही क्या, दोनों एक ही बात है ।लेकिन यह जागृति मनुष्य में प्रायः नहीं रहती, अतः मनुष्य को दूसरा को देने के चक्कर में पड़ने की अपेक्षा यही ज्यादा उचित है कि खुद प्राप्त करता रहे, अपने-आप को साधता रहे । यदि जगत् को कुछ देने की इच्छा हो भी तो इसलिए कि जगत् से बहुत कुछ लिया है, वे लेते रहते हैं तो उसे देना अपना कर्तव्य है, कर्ज उतारना जरूरी है । इसलिए नही कि जगत् पर कोई अहसान करना है ।

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