”शूद्रक विचरित ‘मृच्छकटिकम’ एवं भासरचित ‘दरिद्राचारुत्तम’ का तुलनात्मक अध्ययन ” | ”Shudrak Vichirit ‘Mrachchhkatikam’ Evan Bhasrachit ‘Daridracharuttam’ Ka Tulnatmak Adhyayan”

”शूद्रक विचरित ‘मृच्छकटिकम’ एवं भासरचित ‘दरिद्राचारुत्तम’ का तुलनात्मक अध्ययन ” | ”Shudrak Vichirit ‘Mrachchhkatikam’ Evan Bhasrachit ‘Daridracharuttam’ Ka Tulnatmak Adhyayan”

”शूद्रक विचरित ‘मृच्छकटिकम’ एवं भासरचित ‘दरिद्राचारुत्तम’ का तुलनात्मक अध्ययन ” | ”Shudrak Vichirit ‘Mrachchhkatikam’ Evan Bhasrachit ‘Daridracharuttam’ Ka Tulnatmak Adhyayan” के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : ”शूद्रक विचरित ‘मृच्छकटिकम’ एवं भासरचित ‘दरिद्राचारुत्तम’ का तुलनात्मक अध्ययन ” है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Renu Singh | Renu Singh की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 13.5 MB है | पुस्तक में कुल 228 पृष्ठ हैं |नीचे ”शूद्रक विचरित ‘मृच्छकटिकम’ एवं भासरचित ‘दरिद्राचारुत्तम’ का तुलनात्मक अध्ययन ” का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | ”शूद्रक विचरित ‘मृच्छकटिकम’ एवं भासरचित ‘दरिद्राचारुत्तम’ का तुलनात्मक अध्ययन ” पुस्तक की श्रेणियां हैं : literature

Name of the Book is : ”Shudrak Vichirit ‘Mrachchhkatikam’ Evan Bhasrachit ‘Daridracharuttam’ Ka Tulnatmak Adhyayan” | This Book is written by Renu Singh | To Read and Download More Books written by Renu Singh in Hindi, Please Click : | The size of this book is 13.5 MB | This Book has 228 Pages | The Download link of the book "”Shudrak Vichirit ‘Mrachchhkatikam’ Evan Bhasrachit ‘Daridracharuttam’ Ka Tulnatmak Adhyayan”" is given above, you can downlaod ”Shudrak Vichirit ‘Mrachchhkatikam’ Evan Bhasrachit ‘Daridracharuttam’ Ka Tulnatmak Adhyayan” from the above link for free | ”Shudrak Vichirit ‘Mrachchhkatikam’ Evan Bhasrachit ‘Daridracharuttam’ Ka Tulnatmak Adhyayan” is posted under following categories literature |


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काव्य का अन्यतम प्रयोजन है - ‘सद्यः परिनिवृति' अर्थात् पाठक अथवा दर्शक को रसानुभूति । किसी भाव विशेष का चित्र मनस्पटल पर जितनी शीघ्रता एवं तीव्रता से उभरता है उस भाव विशेष की अनुभूति भी उसी अनुपात मे होती है। इस यथार्थ दृष्टि कोण को ध्यान में रखकर ही श्रव्य की अपेक्षा दृश्य काव्य की महत्ता स्वीकार की गई है - काव्येषु नाटकं रम्यम् । नाटकों में जिस प्रकार का विम्ब अभिनेताओं द्वारा उपस्थित किया जा सकता है वैसा बिम्ब (श्रव्यकाव्य में) केवल शब्दो के माध्यम से उपस्थित कर पाना अतीव कठिन है। यदि शब्द चित्र उभार भी दिया जाय तो उसे मनस्पटल पर देखने के लिए सुविज्ञ हृदय की अपेक्षा होती है।

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