ऊर्जा और आत्मनिर्भरता | Urja Aur Atmanirbharta

ऊर्जा और आत्मनिर्भरता : योना फ्रीडमन | Urja Aur Atmanirbharta : Yona Friedman

ऊर्जा और आत्मनिर्भरता : योना फ्रीडमन | Urja Aur Atmanirbharta : Yona Friedman के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : ऊर्जा और आत्मनिर्भरता है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Arvind Gupta | Arvind Gupta की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 2.8 MB है | पुस्तक में कुल 92 पृष्ठ हैं |नीचे ऊर्जा और आत्मनिर्भरता का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | ऊर्जा और आत्मनिर्भरता पुस्तक की श्रेणियां हैं : children, Knowledge, science

Name of the Book is : Urja Aur Atmanirbharta | This Book is written by Arvind Gupta | To Read and Download More Books written by Arvind Gupta in Hindi, Please Click : | The size of this book is 2.8 MB | This Book has 92 Pages | The Download link of the book "Urja Aur Atmanirbharta" is given above, you can downlaod Urja Aur Atmanirbharta from the above link for free | Urja Aur Atmanirbharta is posted under following categories children, Knowledge, science |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी : , ,
पुस्तक का साइज : 2.8 MB
कुल पृष्ठ : 92

Search On Amazon यदि इस पेज में कोई त्रुटी हो तो कृपया नीचे कमेन्ट में सूचित करें |
पुस्तक का एक अंश नीचे दिया गया है : यह अंश मशीनी टाइपिंग है, इसमें त्रुटियाँ संभव हैं, इसे पुस्तक का हिस्सा न माना जाये |

निर्भरता के लिए जानकारी का आदान-प्रदान
आत्म हम जिस विश्व संकट में जो रहे हैं उसका असर हमारी सेहत और आजीविका, पर्यावरण और सामाजिक संबंधों, अर्थ व्यवस्था, प्रौद्योगिकी और हमारी राजनीति पर भी स्पष्ट दिखता है। इस गभीर संकट के कारण पृथ्वी पर अब हमारा जीना भी दूभर हो गया है। दुनिया के तमाम देशों ने मिलकर 50 6000 से भी अधिक आणविक अस्त्रों का जखीरा इकट्ठा किया है, जो सारे विश्व को कई बार नए करने के लिए पर्याप्त है। उसके बाद भी अस्त्रों की होड़ तेजी से बढ़ रही है। एक और दुनिया, अस्त्रों के उत्पादन पर रोजाना 100 करोड़ डालर खर्च करती है। दूसरी और हर साल, इंदु करोड़ लोग भूख से मरते हैं - यानी 32 लोग प्रति मिनट, जिनमें अधिकांश बच्चे होते हैं। विकासशील देश अस्त्रों पर, स्वास्थ्य सेवाओं की तुलना में, तीन गुना खर्च करते हैं। एक ओर जहां दुनिया के 35 प्रतिशत लोगों को पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है, वहीं दूसरी ओर दुनिया के आधे से अधि क इंजीनियर और वैज्ञानिक नए अत्रों के शोध और उत्पादन में लिप्त हैं। जहां अर्थशास्त्री असीमित विकास के सपने संजो रहे हैं, वहीं पृथ्वी के सीमित साधन तेजी से लुप्त हो रहे हैं। फैक्ट्रिया अपनी गंदगी को साफ किए बिना बेरहमी से इधर-उधर फेंक रही हैं। उन्हें यह नहीं पता कि इस पृथ्वी पर कोई भी 'कड़ादान'

You might also like

Leave A Reply

Your email address will not be published.