वामन पुराण | Vaman Puran

वामन पुराण : वेदव्यास | Vaman Puran : VedVyas |

वामन पुराण : वेदव्यास | Vaman Puran : VedVyas | के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : वामन पुराण है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Ved Vyas | Ved Vyas की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 11.6 MB है | पुस्तक में कुल 196 पृष्ठ हैं |नीचे वामन पुराण का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | वामन पुराण पुस्तक की श्रेणियां हैं : dharm, hindu

Name of the Book is : Vaman Puran | This Book is written by Ved Vyas | To Read and Download More Books written by Ved Vyas in Hindi, Please Click : | The size of this book is 11.6 MB | This Book has 196 Pages | The Download link of the book "Vaman Puran" is given above, you can downlaod Vaman Puran from the above link for free | Vaman Puran is posted under following categories dharm, hindu |


पुस्तक के लेखक :
पुस्तक की श्रेणी : ,
पुस्तक का साइज : 11.6 MB
कुल पृष्ठ : 196

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श्रीहरिः॥ ॥ॐ नमो भगवते क्रिमाद।
अथ श्रीवामनपुराणम् |
पहला अध्याय
श्रीनारदजीका पुलस्त्य ऋषिसे वामनायी प्रश्न; शिवजीका
| लीलाचरित्र और जीमूतवाहन होना । नारायणी नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।। भगवान् श्रीनारायण, मनुष्योंमें प्रेस नर, भगवती देवी सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥ | सरस्वतीदेवी और (पुराणोंके कर्ता) महर्षि व्यासजीको
नमस्कार करके जय (पुराणों तथा महाभारत आदि | | त्रैलोक्यराज्यमाक्षिप्य बलेरिन्द्राय यो ददौ।
| ग्रन्थों) का उच्चारण (पठन) करना चाहिये। श्रीधराय नमस्तस्मै छद्मवामनरूपिणे ॥ १
जिन्होंने लिसे (भूमि, स्वर्ग और पाताल-इन)
तीनों लोकोंके राज्यको छीनकर इन्द्रको दे दिया, इन पुलस्त्यषिमासीनमाश्रमे वाग्विदां वरम्।।
मायामय वामनरूपधारी और लक्ष्मीको हदसमें धारण |
| करनेवाले विष्णुको नमस्कार है। नारदः परिपप्रच्छ पुराणं वामनाश्रयम्॥ २ |
(एक बारकी बात है कि-) वाग्मियोंमें श्रेष्ठ
विद्दुर पुलस्त्य ऋषि अपने आश्रममें बैठे हुए थे। कथं भगवता ब्रह्मन् विष्णुना प्रभविष्णुना। [(वह) नारदजीने उनसे वामनपुराण कथा (इस वामनत्वं भूत पूर्व तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ।। ३ प्रकार) पूड़ी। उन्होंने कहा-ब्रह्मन्! महाप्रभावशाली
भगवान् विष्णुने कैसे वामनका अवतार ग्रहण किया था, कथं च वैष्णवो भूत्वा प्रादौ दैत्यसत्तमः। इसे आप मुझ जिज्ञासुको बतलायें। एक तो मेरी यह | त्रिदशैर्युयुधे सार्धपत्र में संशयो महान्॥४|शङ्का है कि दैत्यवयं प्रहादने विष्णुभक्त होका भी
१. मा खानुका - अपने विभइ घरमय ही हैं, को क अ और कृ हुए। १
५ या भ v प्रशन प्रचारक है, अतः फतव में सर्वत्र इन को नमस्कार किया गया।। - ५ इस लोनको मङ्गलिक में पढ़नेको चन प्रण है। महाभकाम'' है; पर उपलबसे पुरानोंका है ग्रहण किया है। पापा । दश पुरन राम चरित तथा कार्न वेदपक चारतं विदुः।
| जयंत काम में प्रवदन्ति भःि । (भव-२१।१।५4) =ो पुरा और कानून (बेन) ये मेर, जिसे बार- १-रो मग

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