सामान्य भाषा विज्ञान | Samanya Basha Vigyan

सामान्य भाषा विज्ञान : सक्सेना बाबू राम |Samanya Basha Vigyan : Saxena Babu Ram

सामान्य भाषा विज्ञान : सक्सेना बाबू राम |Samanya Basha Vigyan : Saxena Babu Ram के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : सामान्य भाषा विज्ञान है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Saxena Babu Ram | Saxena Babu Ram की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 981.8MB है | पुस्तक में कुल 304 पृष्ठ हैं |नीचे सामान्य भाषा विज्ञान का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | सामान्य भाषा विज्ञान पुस्तक की श्रेणियां हैं : Knowledge

Name of the Book is : Samanya Basha Vigyan | This Book is written by Saxena Babu Ram | To Read and Download More Books written by Saxena Babu Ram in Hindi, Please Click : | The size of this book is 981.8MB | This Book has 304 Pages | The Download link of the book "Samanya Basha Vigyan" is given above, you can downlaod Samanya Basha Vigyan from the above link for free | Samanya Basha Vigyan is posted under following categories Knowledge |


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पुस्तक का साइज : 981.8MB
कुल पृष्ठ : 304

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जिन भाषाओं का इतिहास मालूम है, उनसे पता चलता है कि कल जो भाषा श्लिष्ट थी वही आज कालातर में अयोगात्मक हो चली है। संस्कृत से विकसित हिन्दी आदि आधुनिक भाषाएँ उदाहरण-स्वरूप हैं। चीनी भाषाओं में संपनत्यसूचक शब्द किसी समय पूरे अर्थतत्व में यह अनुमान किया जाता है। परसर्ग के रूप में प्रयोग में आने वाले शब्द (में का आदि) पूर्वकाल में अर्य-पूर्ण (मध्य, कृत आदि) शब्द थे यह तो स्पष्ट ही है । संस्कृत के क्रियापदों में -ते सि मि आदि प्रत्यय वस्तुतः पूर्वकाल के सर्वनामों के अंश हैं यह निश्चय प्रायः भाषाविज्ञानियों ने स्वीकृत किया है। मात्र शब्द कालांतर में प्रत्यय का रूप धारण कर लेते हैं। इस बात के प्रचुर उदाहरण अन्य भाषाओं में भी मिलते हैं। इनका उल्लेस पर पन्द्रहवें अध्याय में १० ९२ पर किया जा चुका है। इस प्रकार अनुमान है कि । अश्लिष्ट से श्लिष्ट, उससे अश्लिष्ट योगात्मक और अंत में प्रयोगात्मक अवस्था । आती है। और फिर अपोगात्मक से अश्लिष्ट योगात्मक, उसशे दिलष्ट और फिर अश्लिष्ट अवस्था आती है। अनुमान है कि कालचक्र में भाषा का विकास इसी क्रम जे होता आ रहा है। वर्तमान सृष्टि की प्रारंभिक भाषा प्रश्लिष्ट धौ या अयोगात्मक, I इसका निश्चय करना, साक्षी प्रमाणों के अभाव में, नितान्त असंभव है। मैक्समूलर का यह अनुमान कि आदिम आयं केवल पातुओं का उच्चारण कर विचार विनिमय करता था उपहासास्पद हो साबित हुआ।
(ख) इतिहासिक वर्गीकरण जिस प्रकार परिवारों के इतिहास में कोई आदि पुरुष होता है और उससे फिर शालाएँ फुट निकलती हैं, उसी प्रकार ऐसा लग जाता है कि आग जो भाषाएँ संसार में मौजूद हैं उनकी भी आदि-भाषाएँ ची। यूरोप बालों को जब १७ वी शताब्दी में संस्कृत का पता चला और बाद को विद्वानों ने उसको संटिग और शीक से तुलना की, तो इनमें इतनी समानता की बातें मिली कि इनके आधार पर इनके भादि स्रोत की भाषा की कल्पना की गई। इस आदि भाषा की शाखाएँ प्राणाएँ ही वर्तमान काल को आर्यभाषाएं हैं। आदिम आर्यभाषा की प्वनियों और व्याकरण तथा शब्दावली का अनुमान करके कैसे कैसे बाद की आर्यभाषाएँ उससे फूट निकलीं-यह सब अध्ययन उसी प्रकार का है जैसा किमी आदि पुरुष के परिवार का। इसी दृष्टांत से भाषाओं के विषय में भी जननी, भगिनी, दुहिता आदि शब्दों का प्रयोग किया गया। पर मनुष्य-वर्ग के परिवार और इतिहासिक संबंध रसनैबाली भाषाओं के औच की समता को केवल अलंकाररूप समझना चाहिए। जननी, बहिन, बेटी

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