भक्तामाराकाल्यान्मंदिर | Bhaktamarakalyanmandir

भक्तामाराकाल्यान्मंदिर : जह्वेरी जीवनचन्द्र | Bhaktamarakalyanmandir : Jahveri Jivan Chandra

भक्तामाराकाल्यान्मंदिर : जह्वेरी जीवनचन्द्र | Bhaktamarakalyanmandir : Jahveri Jivan Chandra के बारे में अधिक जानकारी :

इस पुस्तक का नाम : भक्तामाराकाल्यान्मंदिर है | इस पुस्तक के लेखक हैं : Jahveri Jivan Chandra | Jahveri Jivan Chandra की अन्य पुस्तकें पढने के लिए क्लिक करें : | इस पुस्तक का कुल साइज 16.3MB है | पुस्तक में कुल 416 पृष्ठ हैं |नीचे भक्तामाराकाल्यान्मंदिर का डाउनलोड लिंक दिया गया है जहाँ से आप इस पुस्तक को मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | भक्तामाराकाल्यान्मंदिर पुस्तक की श्रेणियां हैं : hindu

Name of the Book is : Bhaktamarakalyanmandir | This Book is written by Jahveri Jivan Chandra | To Read and Download More Books written by Jahveri Jivan Chandra in Hindi, Please Click : | The size of this book is 16.3MB | This Book has 416 Pages | The Download link of the book "Bhaktamarakalyanmandir " is given above, you can downlaod Bhaktamarakalyanmandir from the above link for free | Bhaktamarakalyanmandir is posted under following categories hindu |


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पुस्तक का साइज : 16.3MB
कुल पृष्ठ : 416

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शनार्णवेऽपि
“पद्मिनी राजसाथ, मेलभिभुतपोधनाः ।।
चे देशमुपसर्पन्ति, तत्र देशे शुभं वदेत् ॥ १ ॥"-अनु० पुष्पर प्राधान्ये पद्मानामिति । चतुर्दशस्वमेवापि कुसुमक् प्रशस्या । तीर्थक्रयाहार विहारसमबत्यसरे कुसमष्टिः शुभकृति विचार्यम्। स्तपान्ते लक्ष्मीशब्दो मागल्याभाभी । हैन स्तोत्रं पिपरिणां शुश्रूणां याचिस्यानां निदिध्यासूनां च पुरुषाणामा
समारोरनारत फयाणपरम्परा भविष्यतीत्यर्थः । अप(वा) प्राणिप्रतिधातुः रिव । उक्त च
*वारांराशिरसो प्रसूव भवती रताकरत्वं गतो
विष्णुस्त्वत्पतितामवाप्य भुवने जातखिलौकीपतिः । कन्दप जगचित्तनन्दन इति वन्दनत्वादभूत् ।
सर्वत्र वदनुपणधिनी पद्मे ! महत्वस्थितिः ॥ १॥"-शार्दैछ। | अन्योऽपि भोऽर्थः सुपीभिः स्वधिया व्याख्येयः । इति चतुधारिशालार्थः सम्पूर्णः । तत्सम्पूत सम्पूर्णेयं भक्तामरस्तववृत्तिः सप्रभावककथानिकालंयुक्ता ॥ (अब प्रशस्ति
गिरां गुफपाची कवीन्देषु वाणी | चतुर्वर्णवयं धतुर्वर्णसः।। गुरुभानुशास्ता सुपीः श्रोतृवर्गों
जयेयुर्जगत्याममी आसमुद्रम् ॥ १॥-भुजङ्गप्रयातम् श्री'चन्द्र'गच्छेऽमयसूरिवंयो
श्रीरुद्रपड़ीयगणाधिचन्द्राः । श्रीचन्द्रमूरिप्रवरा बभुस्ते
यज्ञातरः श्रीविमलेन्दुसंशाः ॥ ३ ॥-इन्द्रा तत्पड़े जिनभत्रसूरिगुरवः सहन्धिलब्धप्रभाः | सिद्धान्ताम्बुधिकुम्भसम्भवनिभाः मेमनीषाशुभाः । जातः श्रीगुणशेखराभिषगुरुसास्मात् तपोनिमंलः शीश्रीतिको जगत्तिलक इत्यासीवू गुरुमागणीः ॥ ३ ॥–शार्दू
| "मपातं चतुर्थः । 'अनविलिः' इति ।

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